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खोखला ही खोखला
प्रणाम / नमस्ते - शान्ता शमाा
वास्तव में –
सिर के ऊपर आिमान है, हम िबने देखा है |
पखेरू उड़ते रहते हैं, हम ि...
कोई अच्छा है तो कहीं कोई बुरा, हम िबने देखा है |
‘िु’रंग वाली ही नहीं, वह िुरंगवाली भी है |
िबको ‘धर’ती है, इिसलए वह धरती ...
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खोखला ही खोखला

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Publicada em

Another stinging poem on the current human relationships

Publicada em: Aperfeiçoamento pessoal
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खोखला ही खोखला

  1. 1. खोखला ही खोखला प्रणाम / नमस्ते - शान्ता शमाा वास्तव में – सिर के ऊपर आिमान है, हम िबने देखा है | पखेरू उड़ते रहते हैं, हम िबने देखा है | तारे झिलसमल करते हैं, हम िबने देखा है | िूरज-चााँद उगते-डूबते हैं, हम िबने देखा है | बादल ववचरण करते हैं, हम िबने देखा है | ररमझिम पानी बरिता है, हम िबने देखा है | कभी गाज भी गगरता है, हम िबने देखा है | आिमान का रंग नीला है, हम िब मानते हैं | वही है उिका अिली रंग? हम न जानते हैं | कई ग्रहों का घर है वह, हम िब मानते हैं | हो-न-हो वह है न खोखला ?! ‘धर’ती – पााँव तले बहुत कु छ है, हम िबने देखा है | कहीं पन्ने-िे खेत हैं, हम िबने देखा है | कहीं पहाड़ड़यााँ – चट्टान हैं, हम िबने देखा है | कहीं खाई और गड्ढ़े हैं, हम िबने देखा है | कहीं तो दलदल-कीचड़ है, हम िबने देखा है | कहीं ऊाँ चे लम्बे पेड़ हैं, हम िबने देखा है | कहीं जंगल, कहीं िाड़डयााँ हैं, हम िबने देखा है | कहीं अववरल बहती नददयााँ हैं, हम िबने देखा है | कहीं स्रोत हैं, कहीं प्रपात हैं, हम िबने देखा है | और भी कु छ – तरह-तरह के जीव-जन्तु हैं, हम िबने देखा है | कई तरह के पक्षी भी हैं, हम िबने देखा है | कोई मााँिाहारी तो कोई शाकाहारी, हम िबने देखा है | कहीं न्याय है, कहीं अन्याय है, हम िबने देखा है | कहीं पाप तो कहीं पुण्य है, हम िबने देखा है |
  2. 2. कोई अच्छा है तो कहीं कोई बुरा, हम िबने देखा है | ‘िु’रंग वाली ही नहीं, वह िुरंगवाली भी है | िबको ‘धर’ती है, इिसलए वह धरती है | फिर भी वह है न खोखली ?! कु छ चेहरे – िामना पड़ने पर अधूरी मुस्कान, हम िबको पता है | औपचाररकता के कु छ प्रश्न, हम िबको पता है | बदले में कु शल-मंगल की बातें, हम भी पूछते हैं | अपनी मतलब िे बोलते हैं, हम भी िमिते हैं | स्वार्ा-सिवि के पश्चात् हमें न पहचानते हैं | ऐिे िब चेहरे हैं न खोखले ?! देवी माता िरस्वती भी – मात्र धनाजान का िाधन बनी है, हम िबको पता है | वाणी अब वाणी – ववहीन, मन-मन कु ढ़ रही है | लोग – लालच में पड़ उिे ववकृ त करते हैं | िूठी प्रशंिा-खुशामद िुन कान बलहीन हो गये हैं | यह मामला है न खोखला ?! दशान बबकते – मन का बोि उतारने -- दैव-द्वार जाते हैं | जीभर दशान कर न पाते, धक्का खाकर आते हैं | दशान भी बबकते हैं िवा ववददत ित्य है | गभा-गृह में जो बैठा है, अनजान-िा अववचल है | क्या यह भी खोखला है ?! हर क्षेत्र में हर जगह हमें ददखता है खोखलापन ! अंत इिका होगा कब? कै िे ? न आप जानते हैं न हम जानते हैं | X--- X--- X

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