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Bhagavat gita chapter i

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Publicada em: Educação
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Bhagavat gita chapter i

  1. 1. Chapter I अर्जुन-विषाद-योगः Arjuna's spiritual conversation through sorrow. धृतराष्ट्र उिाच------ धर्ुक्षेत्र कज रुक्षेत्रे सर्िेता यजयजत्सिः। र्ार्काः पाण्डिाश्चैि वकर्कज िुत सञ्जय ।। सञ्जय उिाच:- दृष्ट्वा तजर् पाण्डिानीकं व्यूढं दजयोधनस्तदा । आचायुर्जपसङ्गम्य रार्ा िचनर्ब्रिीत् ।।2।। पश्यैतां पाण्डजपजत्राणार्ाचायु र्हतीं चर्ूर्् । व्यूढां द्रौपदपजत्रेण ति विष्येण धीर्ता ।l3ll अत्र िूरा र्हेष्वासा भीर्ार्जुनसर्ा यजवध। यजयजधानो विराटश्च द्रजपदश्च र्हारथः।।4 ll धृष्ट्के तजश्चेवकतानः काविरार्श्च िीयुिान् । पजरुवर्त् कज न्तिभोर्श्च िैब्यश्च नरपजङ्गिः ।।5ll यजधार्न्यजश्च विक्राि उत्तर्ौर्ाश्च िीयुिान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सिु एि र्हारथाः।।6ll Dhutaraashtra said:- O…. Sanjaya! What indeed did my people and the followers of the paandavaas do after having assembled in the holy land of kurukshetra, eager to join battle? (1) Sanjay said:- Then seeing the army of the paandavaas arranged in battle order, king Duryodhana for his part approached his teacher Drona and spoke to him the following words:-- (2) O..aachaarya(teacher)! Behold this great army of the sons of Paandu, arrayed in battle order by your talented disciple, the son of drupada. (3) Here (in that army) are many brave bow-men of note who are equal to Bhima and Arjuna in battle--- great car-warriors like yuyudhaana, viraata and Drupada; (4) Dhrushtaketu Cekitaana and the brave king of Kaashi, Purujit, Kuntibhoja and Shaibya the best of men; (5) The powerful Yudhaamanyu, the brave Uttamouja, the son of Subhadra, and the sons of Droupadi--- all these are indeed noted car-warriors. (6) धृतराष्ट्र ने सञ्जय से प्रश्न वकया:- हे सञ्जय! िास्ति र्ें र्ो धर्ुक्षेत्र है उस कज रुक्षेत्र र्ें यजद्ध करने के विए एकवत्रत हुए हर्ारे पक्ष के िोगों और पाण्डिों ने वकया ही क्या? ( सञ्जय-- िब्द का अथु है घृणा-द्वेष पर विर्य प्राप्त) (1) --वनष्पक्ष र्ो होता है उसी को ज्ञान दृवष्ट् प्राप्त होती है ।यही कारण है वक भगिान व्यास ने यजद्ध की घटनाओं को सर्क्ष देखने की क्षर्ता उन्हें प्रदान की थी । सञ्जय ने कहा:- र्हारार् दजयोधन ने पाण्डिों की सेनाओं को यजद्ध के विए तैयार खडे देखा, तजरंत आचायु द्रोण के पास र्ाकर यों कहा:- (2) आचायु र्ी ! आपके विष्य द्रजपद-पजत्र श्रेष्ठ योद्धा द्वारा तैनात इस बहुत बडी पाण्डि सेना को देन्तखयेगा ।( दजयोधन अपने आचायु का अपर्ान करता है---तात्पयु यह है वक आपसे विक्षा पाकर आप ही पर प्रयोग करने आए हैं---उन्हें वसखाना आपकी वकतनी बडी र्ूखुता है)….. (3) यहााँ (पाण्डिों की सेना र्ें)िूर-िीर, बडे धनजधुर, यजद्ध र्ें भीर् और अर्जुन-सर् अर्जुन-सर् यजयजधान , विराट- रार्, द्रजपद देिाधीि, धृष्ट्के तज, चेवकतान, िीयुिान् कािी-नरेि, पजरुवर्त,कज न्तिभोर् , र्ानिश्रेष्ठ िैब्य, र्हा िन्तििािी यजधार्न्यज , िीर उत्तर्ौर्ि, सजभद्रा -पजत्र, द्रौपदी के पजत्र---आवद सारे र्ो उपन्तथथत हैं--र्हारथी ही हैं ।।( ग्यारह हजार धनजधुरों का नेतृत्व करनेिािा र्हारथी कहिाता था )। (4,5,6)
  2. 2. अस्माकं तज विविष्ट्ा ये ताविबोध वद्वर्ोत्तर् । नायका र्र् सैन्यस्य संज्ञाथं तान् ब्रिीवर् ते ||7|| भिान् भीष्मश्च कणुश्च सवर्वतञ्जयः। अश्वत्थार्ा विकणुश्च सौर्दवत्तर्ुयद्रथः।l8ll अन्याय च बहिः िूरा र्दथे त्यिर्ीविताः। नानािस्त्रप्रहरणाः सिे यजद्धवििारदाः ll9ll अपयाुप्तं तदस्माकं बिं भीष्मावभरवक्षतर््। पयाुप्तं न्तत्वदर्ेतेषां बिं भीर्ावभरवक्षतर्् ll10 ll अयनेषज च सिेषज यथाभागर्िन्तथथताः। भीष्मर्ेिावभरक्षिज भििः सिु एि वह।।(11) तस्य सञ्जनयन् हषं कज रुिृद्धः वपतार्हः। वसंहनादं विनद्योच्ैः िङ् खं दध्मौ प्रतापिान् ।।12 ।। ततः िङ् खाश्च भेयश्च पणिानकगोर्जखाः। सह सैिाभ्यहन्यि स िब्दस्तजर्जिोऽभित् ।। 13 ।। ततः श्वेतैहुयैयजुिे र्हवत स्यन्दने न्तथथतौ । र्ाधिः पाण्डिश्चैि वदव्यौ िङ् खौ प्रदध्मतजः ।। 14 ।। पाञ्चर्न्यं हृषीके िो देिदत्तं धनंर्यः। पौण्डरं दध्मौ र्हािङ् खं भीर्कर्ाु िृकोदरः।। 15 ।। O best of Braahmanaas, i shall mention for your information the names of the distinguished leaders of our army. (7) Yourself, Bheeshma and Karna, the victorious krupa, Ashwatthaama, Vikarna and Jayadratha,the son of somadatta. (8). These and many more brave men, who are ready to lay down their lives for my sake and who fight with various types of weapons, are present here. All of them are seasoned warriors.(9) Though numerically superior, inadequate is the army of ours defended by Bheeshma, while theirs guarded by Bheema is adequate. (10) Therefore do you all protect Bheeshma remaining in appropriate positions in your respective divisions. (11) Cheering him up, the valiant grandfather Bheeshma, the oldest of the Kurus, sounded a lion roar loudly and blew his conch---shell horn. (12) Thereupon, conchs, kettle--drums, tabors, military—drums and cow horns all blared out suddenly, causing a tremendous sound........(13) Then Shri Krishna and Arjuna, seated in a great chariot with white horses yoked to it, blew their celestial Conch---shell horns............. (14) Shri Krishna blew his conch Paanchajanya, Arjuna blew Devadatta, and Bheema of terribly terrible deeds sounded his great conch Paundra...........(15) हे… ब्राह्मण श्रेष्ठ! र्ेरे सेनानायकों के बारे र्ें र्ैं आपको अिगत कराता हाँ । हर्ारे पास र्ो उच् श्रेणी के िीर हैं उनके बारे र्ें भी बताता हाँ ।(7) आप, भीष्म, कणु, र्हाविर्ेता कृ पाचायु, अश्वत्थार्ा, विकणु, सोर्दत्त के पजत्र भूररश्रिा, र्यद्रथ आवद अत्यजत्तर् योद्धा उपन्तथथत हैं (8) इतना ही नहीं ये सारे र्ेरे विये प्राण त्यागने के विए भी तैयार हैं, तरह-तरह के िस्त्र तीर आवद इनके पास हैं, पहुाँचे हुए(श्रेष्ठ) अनेकानेक िीर हैं ।।9।। भीष्म के नेतृत्व र्ें बहुत बडी सेना है, भीर् की सेना उसकॆ अवधकाराधीन है। स्वतंत्र नहीं है।।10।। (सेना बडी या छोटी हो--विर्य उस पर वनभुर नहीं होता। विर भी स्वप्रिंसा-आत्म प्रिंसा करता है घर्ण्डी दजयोधन-- अल्पबजन्तद्ध --) सेनाओं से दजयोधन ने कहा वक िे अपने- अपने थथान पर टोवियों र्ें र्र्ा होकर सिद्ध हो र्ायें , सबका कतुव्य है भीष्म वपतार्ह की रक्षा करना ! ( 11) तात्पयु यह हुआ --- स्वयं न सही, र्ेरा कहना र्ानकर कार् कीवर्ये---दजयोधन के ये िब्द सेनानायकों का अपर्ान-- की तरह िगते हैं | न्तथथवत वबगडती देखकर र्हा प्रतापी कज रुकज ि के ियोिृद्ध वपतार्ह भीष्म ने दजयोधन को प्रोत्सावहत करने के विए वसंहनाद कर िंख ध्ववन की ।(12) दजयोधन की बातें गजरु द्रोण तथा सेनापपवतयों को बजरी िगीं । वपतार्ह ने न्तथथवत संभािने के विए अपनी ओर से यजद्ध िजरू वकया र्ो अनजवचत था । इसके पश्चात अचानक िंख , भेरी आवद यजद्ध के सारे बार्े एक साथ बर्ने िगे । कौरिों के कारण िातािरण बार्ों की वर्वश्रत ध्ववनयों से भर गया ।13) ऐसा होते ही सफे द घोडों िािे अवत अद् भजत रथ पर विरार्र्ान र्ाधि (र्ा का अथु है श्री अथाुत् िक्ष्मी धि का अथु है पवत --विष्णज ! विष्णज और कृ ष्ण अिग-अिग नहीं हैं) और अर्जुन ने अपने-अपने वदव्य िंखों से ध्ववन वनकािी ।(14) हृषीके ि ने (इन्तियों को िि र्ें रखनेिािे श्री कृ ष्ण) िंख पाञ्चर्न्य बर्ाया | धनन्र्य ने िंख देिदत्त बर्ाया,र्हािीर भीर् सेन ने पौण्डर नार्क अपने बहुत बडे िंख से ध्ववन वनकािी | ( रार्ाओं के पास वछपे,,वछपाये धन को हवथयाकर
  3. 3. बाहर िाकर वितरण करने से अर्जुन को धनंर्य अथाुत धन को र्ीतनेिािा कहा गया है | भीर् बहुत खाता था पर पचा िेता था, उसका पेट वचपका रह्ता भेवडये की तरह | िह बडा ही बििान था |) (15) अनि विर्यं रार्ा कज िीपजत्रो यजवधवष्ठरः । नकज िः सहदेिश्च सजघोषर्वणपजष्पकौ।। 16 !! काश्यश्च परर्ेष्वासः विखण्डी च र्हारथः । धृष्ट्द् यजम्नो विराटश्च सात्यवकश्चापरावर्तः ।। 17 'll द्रजपदो द्रौपदेयाश्च सिुिः पृवथिी ।। सौभद्रश्च र्हाबाहुः िङ् खान् दध्मजः पृथक पृथक् ।। 18 ।। स घोषो धातुराष्ट्राणां हृदयावन व्यदारयत् । नभश्च पृवथिी चैि तजर्जिो व्यनजनादयन् ।। 19 !! अथ व्यिन्तथथतान्दृष्ट्वा धातुराष्ट्र ान् कवपध्वर्ः । प्रिृत्ते िस्त्रसंपाते धनजरुद्यम्य पाण्डिः ।। 20 !! हृषीके िं तदा िाक्यवर्दर्ाह र्हीपते। अर्जुन उिाच:------ सेनरोरुभयोर्ुध्ये रथं थथापय र्ेऽच्यजत ।। 21 !! यािदेताविरीक्षेऽहं योद् धजकार्ानिन्तथथतान् । कै र्ुया सह योद्धव्य-र्न्तस्मन् रणसर्जद्यर्े ।।22 ।। The king Yudhishthira, the son of Kunti, blew his conch Ajanta vijaya, and Nakula and Sahadeva, Sughosha and Manipushpaka respectively.....(16) The great archer, king of Kaashi, the mighty car-warrior Shikhandi and Dhrushtadyumna and invincible Saatyaki. (17) The king of Drupada, the sons of Droupadi, the mighty- armed Son of Subhadra-- all these, O king, sounded their conch-shell horns again and again everywhere. (18) That tumultuous uproar, resounding ( echoing) in the sky and over the land, pierced the hearts of the followers of Dhrutaraashtra. (19) O king ! Arjuna, the the Pandava-leader with the banner (flag) Crest of a monkey, on seeing the followers of Dhrutaraashtra arrayed for battle and the clash of weapons about to start, held up his bow and said the following words to shree Krishna, ;(20,21) Arjuna said--- O Achyuta ! Please station my chariot between the two armies, so that I may have a view, on the eve of this battle, of all those Standing ready to fight, and learn who all are the persons with whom l have to contend..........(21,22 ) कज न्तिपजत्र रार्ा यजवधवष्ठर ने (राज्य करे या न करे रार्ा के सारे गजण उनर्ें होने के कारण यहााँ उन्हें रार्ा कहा गया है) अपने िङ् ख अनिविर्य से ध्ववन वनकािी । नकज ि का िङ् ख सजघोष तथा सहदेि का िङ् ख र्वणपजष्पक---दोनों भी बर्ने िगे ।-----(16) धनजधुरों की सेना का अवतसर्थु धनजधुर कािीरार्, र्हारथी विखण्डी (विखण्डी का अथु है र्ूंछहीन---नपजंसक--- वपतार्ह भीष्म नपजंसक से यजद्ध नहींकरते । ), धृष्ट्द् यजम्न (धृष्ट्द् यजम्न का अथु है वर्सका यजद्ध र्ें सार्ना न वकया र्ा सके ), विराट नरेि, अर्ेय ( वर्से हराया न र्ा सके ) सात्यवक------(17) हे भूपवत !( इस सम्बोधन से सञ्जय धृतराष्ट्र को अपना उत्तरदावयत्व याद वदिाना चाहते हैं । यजद्ध करना या न करना उन पर ही वनभुर है) द्रजपद , द्रौपदी के पजत्र, बाहुबिी सजभद्रा -पजत्र--- आवद सब ने अपना- अपना िङ् ख बर्ाया ।।........(18) िङ् खों की तजर्जि ध्ववन आकाि और धरती पर छाकर गूाँर् उठी । उसने धृतराष्ट्र -सेना का हृदय-विदीणु कर वदया । पाण्डिों की सेना कौरि-सेना की तजिना र्ें अल्पसंख्यक थी, विर भी उसके साथ दैि -धर्ु-बि था ।---(19) र्हारार्! उस ओर कवप (बन्दर )ध्वर् (झण्डा)िािा अर्जुन आया । यजद्ध आरम्भ करने के विए तैयार खडी धृतराष्ट्र -सेना को उसने देखा, तीर चिाने के पूिु कर्ान (धनजष्) धारण कर श्री कृ ष्ण से यों कहा ।---------(20) अर्जुन उिाच--------(अर्जुन ने कहा): हे अच्यजत !( विष्णज को अच्यजत कहा र्ाता है वर्सका अथु है अपनी न्तथथवत से कभी च्यजत न होने िािा, न पिटने , न ही उतरने िािा ) इन सेनाओं के बीच र्ेरा रथ रोवकए । र्ैं देखना और सर्झना चाहता हाँ वक र्जझे वकन-वकन से यजद्ध करना है, कौन- कौन यजद्ध करने का िक्ष्य िेकर र्ेंरे सार्ने खडे हैं । ----(21,22)
  4. 4. योत्स्यर्ानानिेक्षेऽहं य एतेऽत्र सर्ागताः। धातुराष्ट्र स्य दजबजुद्धेयजुद्धे वप्रयवचकीषुिः ।।23 !! सञ्जय उिाच:--------- एिर्जिो हृषीके िो गजडाके िेन भारत। सेनायोरुभयोर्ुध्ये थथापवयत्वा रथोत्तर्र्् ।।24 !! भीष्म-द्रोण- प्रर्जखतः सिेषां च र्हीवक्षतार््। उिाच पाथु पश्यैतान् सर्िेतान् कज रूवनवत।।25!! तत्रापश्यन्तथथतान्पाथुः वपत्ॠनथ वपतार्हान् । आचायाुन् र्ातजिान् भ्रात्ॠन् पजत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा ।।26 !! श्विजरान् सजहृदश्चैि सेनयोरुभयोरवप । तान् सर्ीक्ष्य स कौिेयः सिाुन् बन्धूनिन्तथधतान् ।।27!! कृ पया परयाविष्ट्ो विषीदविदर्ब्रिीत् । अर्जुन उिाच------ दृष्ट्वेर्ं स्वर्नं कृ ष्ण यजयजत्सजं सर्जपन्तथथतर्् ।।28 !! सीदन्ति र्र् गात्रावण र्जखं च पररिजष्यवत । िेपथजश्च िरीरे र्े रोर्हषुश्च र्ायते ।।29 !! Let me see all those who have arrived to favour the evil- minded son of Dhrutaraashtra in war and are standing ready to join battle. ------------(23) Sanjaya said:- O king Dhrutaraashtra ,! Shri krishna, to whom Arjuna addressed these words, stationed that most splendid Of chariots at a place between the two armies, Confronting Bheeshma, Drona and all those chiefs, and said; " O Arjuna ! see these men of the Kuru horde assembled for battle ."----------(!24,25 ) There he saw standing in both the armies----- fathers, grand-fathers, uncles, brothers, sons, grandsons, comrades, fathers-in-law and bosom friends. Seeing all these Kinsman arrayed, Arjuna was overcome with great pity, and said sorrowing:-----------------(26,27) Seeing these relatives standing eager to join battle my limbs are giving way , my mouth is parching. I get trembling of the body and horripilation ------(28,29 ) धृतराष्ट्र के अल्प तथा दजबजुन्तद्धिािे दजयोधन को तृप्त और खजि करने के विए यजद्ध भूवर् र्ें र्ो िोग एकवत्रत हुए हैं उन्हें र्ैं देखना चाहता हाँ ।( आगे इसका- पररणार् - उस पर विपरीत प्रभाि डािने िािा है)----(23) सञ्जय ने कहा-------------- भारत देि के भरत कज ि र्ें उत्पि हे धृतराष्ट्र ! गजडाके ि ( नींद पर वर्सने विर्य प्राप्त की हो, अथाुत् वर्सका र्न पर िि हो, वकसी भी पररन्तथथवत र्ें विचवित न होता हो) ने र्ब हृषीके ि ( श्री कृ ष्ण )से ये िब्द कहे तब उन्होंने अपना अद् भजत रथ िे र्ाकर दोनों सेनाओं के बीच वपतार्ह भीष्म, आचायु द्रोण तथा अन्य भूपवतयों (रार्ाओं) के सार्ने खडा कर वदया और कहा, "हे पाथु (अर्जुन) ! यहााँ एकवत्रत इन कौरिों को देखो !"--------------------------(24, 25) िहााँ------अर्जुन ने दोनों सेनाओं के योद्धाओं को देखा । वपता िोग , अनेक वपतार्ह , आचायु र्न , र्ाताओं के भाई ( र्ातजि ), छोटे-बडे भाई, सहोदर, पजत्र, पजत्रों के पजत्र (पोते),वर्त्र, ससजर र्न, साथी र्न, वदि से चाहनेिािे, --------ये सब िहााँ उपन्तथथत थे ।-------------(26) कज न्ति पजत्र अर्जुन ने सर्रभूवर् र्ें उपन्तथथत सारे इष्ट् वर्त्र बन्धज बााँधओं को आाँखों के आगे-सार्ने- देखा । उसका र्न वपघि गया, द्रवित हो गया । दजःख -सा अनजभि होने िगा । उसने श्री कृ ष्ण यों कहा----------(27) हे कृ ष्ण! ( कृ ष्ण का िब्दाथु है----1.श्यार्---गहरे नीिे रंग का, 2.कृ ष्----सत्; ण(न)----आनन्द, अथाुत् सन्तच्दानंद स्वरूप, ब्रम्ह स्वरूप ।3.अपने अनजयावययों तथा भिों का दजःख वर्टाने िािा),,,,,र्ेरे िरीर के सारे अङ्ग थकान का अनजभि कर रहे हैं । र्जाँह सूख रहा है ।----------(28) र्ेरे सारे िारीररक अंग कााँपने िगे हैं । रोंगटे खडे हो गए हैं । र्ेरा धनजष् गाण्डीि हाथ से विसि कर छू ट रहा है । िरीर की चर्डी (त्वचा ) र्िन का अनजभि कर रही है । ------------------------------(29)
  5. 5. गाण्डीिं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैि पररदह्यते । न च िक्नोम्यिथथातजं भ्रर्तीि च र्े र्नः ।। 30 !! वनवर्त्तावन च पश्यावर् विपरीतावन के िि । न च श्रेयोऽनजपश्यावर् हत्वा स्वर्नर्ाहिे।। 31 !! न काङ्क्षे विर्यं कृ ष्ण न च राज्यं सजखावन च। वकं नो राज्येन गोविन्द वकं भोगैर्ीवितेन िा ।। 32!! येषार्थे कावङ्क्षतं नो राज्यं भोगाः सजखावन च । त इर्ेऽिन्तथथता यजद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनावन च ।।33!! आचायाुः वपतरः पजत्रास्तथैि च वपतार्हाः । र्ातजिाः श्विजराः पौत्राः स्यािाः संबन्तन्धनस्तथा ।।34 !! My bow Gaandeeva is slipping from my hand. My skin too is burning . I find it impossible to stand firm , and my mind is , as it were , reeling. -----------------(30) O Keshava ! I see adverse omens. I don't feel that any good Will come by killing all one's kinsmen in battle. ---------(31) O Krishna! I do not long for victory, or kingdom, or enjoyments. O Govinda! Of what use is kingdom, enjoyment or even life itself? ---------------------(32) Those for whose sake kingdom, enjoyment, and Pleasures are desired, ---- those very teachers, fathers and sons, as also grand-fathers, uncles, fathers-in- law and other relatives are here stationed in battle ready to give up their lives and possessions. -------(33,34 ) हे के िि! खडे रहने की िन्ति भी र्जझर्ें नहींहै । र्न तो चकरा रहा है । बजरे वनवर्त्त र्ैं देख पा रहा हाँ ।----------(30) के िि िब्द का अथु है------ 1.के विन नार्क असजर का िध वर्सने वकया हो, 2. सजन्दर के ििािा, 3. क--- ब्रह्मा, अ---- विष्णज , ईि--- रुद्र---------इन वत्रर्ूवतुयों को िि र्ें रखनेिािा । वनवर्त्तावद का िि सत्य भी हो सकता है , नहींभी । अपने र्ानवसक क्लेि के कारण ही अर्जुन को बजरे वनवर्त्त वदखाई देने िगे । हे कृ ष्ण ! यजद्ध र्ें अपने ही सगे-संबंवधयों को र्ारना कोई अच्छा कार् नहींहै । इससे क्या भिाई हो सकती है, अथाुत् नहीं।----------(31) हे कृ ष्ण! विर्य, राज्य, सारे सजख-भोग की इच्छा र्जझर्ें नहींहैं । हे गोविन्द! ( गो---- प्राणों को, विन्द----र्ाननेिािा) , वर्नके विए हर् राज्य, सजख-भोग, सजविधायें प्राप्त करना चाहते हैं िे सारे आचायु, वपतृ र्न, सिान, दादा-नाना आवद , र्ार्ागण, ससजर िोग, नाती-पोते, सािे िोग, सर्धी गण आवद र्ान-र्ाि, सब त्यागकर यहााँ सर्र-भूवर् र्ें उपन्तथथत हुए हैं । हर्ें राज्य, सजख-भोग, र्ीिन आवद से क्या वर्िने िािा है? इन सब को िेकर हर् क्या करने िािे हैं ?----------------- ------(32,33,34)
  6. 6. एति हिजवर्च्छावर् घ्नतोवप र्धजसूदन । अवप त्रैिोक्य - राज्यस्य हेतोः वकं नज र्हीकृ ते ।।35 !! वनहत्य धातुराष्ट्र ािः का प्रीवतः स्याज्जनादुन । पापर्ेिाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततावयनः।।36 !! तस्मािाहाु ियं धातुराष्ट्र ान् स्वबान्धिान् । स्वर्नं वह कथं हत्वा सजन्तखनः स्यार् र्ाधि ।।37 !! यद्यप्येते न पश्यन्ति िोभोपहतचेतसः। कज िक्षयकृ तं दोषं वर्त्रद्रोहे च पातकर्् ।।38 !! कथं न श्रेयर्स्मावभः पापादस्मावििवतुतजर्् । कज िक्षयकृ तं दोषं प्रपश्यन्तिर्ुनादुन ।।39 !! कज िक्षये प्रणश्यन्ति कज िधर्ाुः सनातनाः । धर्े नष्ट्े कज िं कृ त्स्नर्धर्ोऽवभर्ित्चजत ।।40!! अधर्ाुवभभिात् कृ ष्ण प्रदजष्यन्ति कज िन्तस्त्रयः । स्त्रीषज दजष्ट्ासज िाष्णेय र्ायते िणुसङ्करः ।।41 !! सङ्करो नरकायैि कज िघ्नानां कज िस्य च ।। पतन्ति वपतरो ह्येषां िजप्तवपण्डोदकवक्रयाः ।।42 !! दोषैरेतैः कज िघ्नानां िणुसङ्करकारकै ः । उत्साद्यिे र्ावतधर्ाुः कज िधर्ाुश्च िाश्वताः ।।43 ।। O Madhusuudana ! Even for the sovereignty of the three wolds, I don't desire to kill them, though myself killed---how much less than for this earthly kingdom----------(35) ( killer of demon Madhu-----Madhusuudana) O Janaardana (Krishna) !---- (one who is the subject of prayer for obtaining wealth and liberation) what joy can there be for us by killing these sons of Dhrutaraashtra ? Though they are murderous villains, only sin Will accrue to us by killing them. (36) Therefore, O Maadhava it is not befitting that we kill Our relations, the sons of Dhrutaraashtra. How could one be happy by the slaughter of one's own kinsmen? ----------(37) O Janaardana! Even if these people, with their Intelligence overpowered by greed, do not see any evil in the decay of families and any sin in the persecution of friends, why should not we, who are aware of the evil of such decay Of families, learn to desist from that sin ?------------------ (38,39) When a clan becomes decadent, its ancient traditions (laws) perish. When traditions perish the entire clan is Indeed overcome by lawlessness. ------------(40) O Krishna! When lawlessness prevails, the women of the clans become corrupt. O Vaarshneya! (Scion of Vrushni--krishna--) when women are corrupted, mixture of classes (promiscuity) prevails. ------------------(41) Promiscuity results only in hell to those destroyers of the clans, as also to the members of the clan. For (being without legitimate progeny to perform obsequies), the spirits of their ancestors fall, deprived of the offerings of rice ball---pinda---and water. -----------(42) By the misdeeds of these ruiners of clans and promoters of promiscuity, the immemorial traditions of the communities and clans are uprooted. ---------(43) हे र्धजसूदन (र्धज नार्क असजर का िध वर्सने वकया हो िह) ! यवद र्ैं र्ारा र्ाऊाँ , तीन िोकों का राज्य र्जझे प्राप्त होनेिािा हो तो भी र्ैं इनकी हत्या नहीं करूाँ गा । इस नाचीज वर्ट्टी को पाने के विए कया इनकी हत्या करूाँ गा ? (35) हे र्नादुन ! ( सम्पवत्त और र्ोक्ष प्राप्त करने के विए वर्सका स्तोत्र करते हों ) धृतराष्ट्र के पजत्रों को र्ारकर हर् िोगों को कै सा सजख वर्िनेिािा है ? इन आततावययों ( वकसी का घर र्िाना, भोर्न र्ें विष घोिना, र्ारने के विए तििार चिाना, औरों की सम्पवत्त, भूवर्, स्त्री आवद का अपहरण करना आवद पापकर्ु करनेिािे) को र्ारने से हर् पाप के भागी होंगे । ( र्हा पंवडत ही क्यों न हो यवद िह आततायी हो तो र्ार डािना चावहए (36) हे र्ाधि ! धृतराष्ट्र के पजत्र र्ेरे अपने ही बन्धज हैं । उन्हें र्ारना ठीक नहीं है ।स्व र्नों को र्ारकर हर् कै से सानन्द र्ी सकते हैं ? अथाुत् असम्भि है । (37 ) िोभ-िािच के कारण (ये हतबजन्तद्ध हो) कज ि धर्ु को भूि गए । ये सर्झा नहीं पा रहे हैं वक कज िनाि, वर्त्र द्रोह का पररणार् वकतना भयानक होता है ! पर हर् िोग तो र्नते हैं । इस पाप से हटने का र्ागु हर् क्यों न ढूाँढ वनकािें ? क्यों न यजद्ध को रोकें ? ( दू सरी ओर कौरिों के र्न र्ें पाण्डिों के प्रवत कोई अपनापन नहीं है )------------------------- (38, 39 ) कज ि के नष्ट् होने से सनातन ( सदा रहनेिािा) कज ि धर्ु नष्ट् हो र्ाते हैं । धर्ु के नष्ट् होने से पूरा कज ि अधर्ु से वघर र्ाता है, घेर विया र्ाता है ।------------------(40) अधर्ु की अवधकता से कज िीन न्तस्त्रयााँ प्रदूवषत हो र्ाती हैं । हे कृ ष्ण ! न्तस्त्रयों के प्रदूवषत होने से िणु सङ्करता ( वर्श्रण ) उत्पि होती है । ब्राह्मण, क्षवत्रय, िैश्य और िूद्र ये हैं चार िणु ।------------------------(41)
  7. 7. इस तरह के वर्िािट अथिा वर्श्रण से उस कज ि तथा उसे नष्ट् करनेिािों को नरक प्राप्त होता है । उनके वपतृ वपण्ड- -र्ि से िवञ्चत रह र्ाते हैं । र्ृतक कज छ सर्य तक वपतृ िोक र्ें िास करते हैं । िे और अन्य वपतृ िोक िावसयों को तृप्त करने के विए ही श्रद्धा से वपण्ड-र्ि दान करते हैं र्ो श्राद्ध कहिाता है । उस सर्य धनहीन तथा अन्य िोगों को भी अि दान वकया र्ाता है ।-------(42) कज िनािकों के कारण उत्पि िणुसंकरता अनेकानेक दोषों को र्न्म देती है । ये दोष िाश्वत कज िधर्ं तथा र्ावतधर्ु को हावन पहुाँचाकर उन्हें नष्ट् कर देंगे!--------------------------(43) उत्सि-कज िधर्ाुणां र्नजष्याणां र्नादुन । नरके वनयतं िासो भितीत्त्यनजिजश्रजर् ।।44 !! अहो बि र्हत्पापं कतजं व्यिवसता ियर्् । यद्राज्यसजखिोभेन हिजं स्वर्नर्जद्यताः ।। 45 !! यवद र्ार्प्रतीकारर्िस्त्रं िस्त्रपाणयः । धातुराष्ट्र ा रणे हन्यजस्तन्मे क्षेर्तरं भिेत् ।। 46 !! सञ्जय उिाच------- एिर्जक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपथथ उपाविित् । विसृज्य सिरं चापं िोक-संविग्न-र्ानसः ।।47 !! इवत श्रीर्िगिद्गीतासूपवनषत्सज ब्रह्मविद्यायां योगिास्त्रे श्री कृ ष्णार्जुनसंिादे अर्जुनविषादयोगो नार् प्रथर्ोऽध्यायः ।।।।।।।।। O Janaardana ! We have heard that residence in hell awaits men, the religious traditions of whose clans have been destroyed.----------------------(44) Alas ! What great sin have we resolved to commit when we prepared ourselves to destroy our kinsmen out of greed for the pleasures of the kingdom! --(45) Far better would it be for me if the sons of Dhrutaraashtra, with weapons in hand, kill me in battle, unarmed and unresisting !------------------(46) Sanjaya said---------- So saying, Arjuna, with his mind overwhelmed with sorrow , abandoned his bow and arrows and sat down on the chariot seat. -------------- (47 ) In the Bhagavad Geeta , which is an Upanishad, a text On Brahman-knowledge, a scripture of spiritual communion, and a dialogue between Shri Krishna and Arjuna, here ends the first chapter named ' Arjuna VishadaYoga ' (Arjuna 's spiritual conversation through Sorrow) . हे र्नादुन! हर्ने सजना है वक कज ि धर्ु को र्ो नष्ट् करते हैं, िवञ्चत रह र्ाते हैं, िम्बे सर्य तक नरक र्ें िास करते हैं । -------(44) राज्य - सजख भोगने की इच्छा से अपने ही बन्धज-बााँधओं की हत्या का दजःसाहस करना वकतना बडा पापकर्ु है, वकतनी नीचता है। हाय,! हर्ने यह कै सा कार् करना चाहा ? !-------------------------------(45) विरोध वकए वबना वनरायजध, वनहत्था खडे र्जझे यवद िस्त्र धारण कर धृतराष्ट्र के पजत्रों ने यजद्ध र्ें र्ार डािा तो वकतना अच्छा होता! र्ेरा भिा होता ! ---------------------------(46) सञ्जय ने कहा-------------- ये िब्द बोिकर तीर गाण्डीि - धनजष िें ककर िोकासंतप्त हो अर्जुन रथ पर बैठ गया । उसके दजख की सीर्ा न रही।--------------(47) ____________________________________________________________________________ ब्रह्म विद्या वसखानेिािा योगिास्त्र श्री कृ ष्णार्जुनसंिाद रूपी उपवनषद श्रीर्दभगिदगीता का प्रथर् अध्याय अर्जुन- विषाद-योग ।। x----------x-----------x

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