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मगध महाजनपद
मगध प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक था। आधुननक पटना तथा गया ज़िला इसमें शाममल थे। इसकी
राजधानी गगररव्रज...
मगध के उत्कर्व करने में ननम्न वंश का महत्वपूिव थथान रहा है-
ब्रहद्रथ वंश
यह सबसे प्राचीनतम राजवंश था। महाभारत तथा पुरािों ...
सबसे पहले उसने मलच्छवव गिराज्य के शासक चेतक की पुरी चेलना के साथ वववाह ककया। दूसरा प्रमुख वैवादहक
सम्बन्ध कौशल राजा प्रसेन...
 अजातशरु धाममवक उदार सम्राट था। ववमभन्न ग्रन्थों के अनुसार वे बौद्ध और जैन दोनों मत के अनुयायी माने जाते
हैं लेककन भरहुत ...
नन्द वंश
३४४ ई. पू. में महापद्यनन्द नामक व्यक्नत ने नन्द वंश की थथापना की। पुरािों में इसे महापद्म तथा महाबोगधवंश में
उग्र...
अब चन्द्रगुप्त भारत के एक ववशाल साम्राज्य मगध का शासक बन गया। मसकन्दर की मृत्यु के बाद सेल्यूकस उसका
उत्तरागधकारी बना। वह ...
मसंहली अनुश्रुनतयों के अनुसार उज्जनयनी जाते समय अशोक ववददशा में रुका जहााँ उसने श्रेठिी की पुरी देवी से वववाह
ककया जजससे म...
(अ) धमवयाराओं का प्रारम्भ, (ब) राजकीय पदागधकाररयों की ननयुक्नत, (स) धमव महापारों की ननयुक्नत, (द) ददव्य
रूपों का प्रदशवन, ...
(४) माथकी- यह रायचूर जजले में जथथत है।
(५) सहसराम- यह बबहार के शाहाबाद जजले में है।
धम्म को लोकवप्रय बनाने के मलए अशोक ने ...
८. जनतंग रामेश्वर- जो ब्रह्मगगरर से तीन मील उ. पू. में जथथत है।
९. एरागुडड- यह आन्र प्रदेश के कू नुवल जजले में जथथत है।
१०...
प्रान्तीय प्रशासन
चन्द्रगुप्त मौयव ने शासन संचालन को सुचारु रूप से चलाने के मलए चार प्रान्तों में ववभाजजत कर ददया था जजन्ह...
यूनानी थरोतों से ज्ञात होता है कक नगर प्रशासन में तीन प्रकार के अगधकारी होते थे-एग्रोनोयोई (जजलागधकारी),
एण्टीनोमोई (नगर आ...
पुरोदहत का कमव त्यागकर सैननक वृनत को अपना मलया था। पुठयममर अजन्तम मौयव शासक वृहद्रथ का प्रधान सेनापनत
था। पुठयममर शुंग के ...
वसुज्येठि या सुज्येठि - अजग्नममर के बाद वसुज्येठि राजा हुआ।
वसुममर - शुंग वंश का चौथा राजा वसुममर हुआ। उसने यवनों को पराजज...
मगध में आन्रों का शासन था या नहीं ममलती है। कु र्ािकालीन अवशेर् भी बबहार से अनेक थथानों से प्राप्त हुए हैं।
कु छ समय के पश...
चन्द्रगुप्त प्रथम ने मलच्छवव के साथ वैवादहक सम्बन्ध थथावपत ककया। वह एक दूरदशी सम्राट था। चन्द्रगुप्त ने
मलच्छववयों के सहयो...
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  1. 1. मगध महाजनपद मगध प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक था। आधुननक पटना तथा गया ज़िला इसमें शाममल थे। इसकी राजधानी गगररव्रज थी। भगवान बुद्ध के पूवव बृहद्रथ तथा जरासंध यहााँ के प्रनतजठित राजा थे।[1] अभी इस नाम से बबहार में एक प्रंमडल है - मगध प्रमंडल। मगध महाजनपद मगध का सववप्रथम उल्लेख अथवव वेद में ममलता है। अमभयान गचन्तामणि के अनुसार मगध को कीकट कहा गया है। मगध बुद्धकालीन समय में एक शक्नतशाली राजतन्रों में एक था। यह दक्षििी बबहार में जथथत था जो कालान्तर में उत्तर भारत का सवावगधक शक्नतशाली महाजनपद बन गया। यह गौरवमयी इनतहास और राजनीनतक एवं धाममवकता का ववश्व के न्द्र बन गया। मगध महाजनपद की सीमा उत्तर में गंगा से दक्षिि में ववन््य पववत तक, पूवव में चम्पा से पश्गचम में सोन नदी तक ववथतृत थीं। मगध की प्राचीन राजधानी राजगृह थी। यह पााँच पहाड़ियों से निरा नगर था। कालान्तर में मगध की राजधानी पाटमलपुर में थथावपत हुई। मगध राज्य में तत्कालीन शक्नतशाली राज्य कौशल, वत्स व अवजन्त को अपने जनपद में ममला मलया। इस प्रकार मगध का ववथतार अखण्ड भारत के रूप में हो गया और प्राचीन मगध का इनतहास ही भारत का इनतहास बना। प्राचीन गणराज्य प्राचीन बबहार में (बुद्धकालीन समय में) गंगा िाटी में लगभग १० गिराज्यों का उदय हुआ। ये गिराज्य हैं- (१) कवपलवथतु के शाक्य, (२) सुमसुमार पववत के भाग, (३) के सपुर के कालाम, (४) रामग्राम के कोमलय, (५) कु शीमारा के मल्ल, (६) पावा के मल्ल, (७) वपप्पमलवन के मौयव, ( ८) आयकल्प के बुमल, (९) वैशाली के मलच्छवव, (१०) ममगथला के ववदेह। --[अंकु र आनन्द ममश्र] मगध साम्राज्य का उदय  मगध राज्य का ववथतार उत्तर में गंगा, पश्गचम में सोन तथा दक्षिि में जगंलाच्छाददत पिारी प्रदेश तक था।  पटना और गया जजला का िेर प्राचीनकाल में मगध के नाम से जाना जाता था। मगध प्राचीनकाल से ही राजनीनतक उत्थान, पतन एवं सामाजजक-धाममवक जागृनत का के न्द्र बबन्दु रहा है। मगध बुद्ध के समकालीन एक शक्नतकाली व संगदित राजतन्र था। कालान्तर में मगध का उत्तरोत्तर ववकास होता गया और मगध का इनतहास (भारतीय संथकृ नत और सभ्यता के ववकास के प्रमुख थतम्भ के रूप में) सम्पूिव भारतवर्व का इनतहास बन गया।
  2. 2. मगध के उत्कर्व करने में ननम्न वंश का महत्वपूिव थथान रहा है- ब्रहद्रथ वंश यह सबसे प्राचीनतम राजवंश था। महाभारत तथा पुरािों के अनुसार जरासंध के वपता तथा चेददराज वसु के पुर ब्रहद्रथ ने ब्रहद्रथ वंश की थथापना की। इस वंश में दस राजा हुए जजसमें ब्रहद्रथ पुर जरासंध एवं प्रतापी सम्राट था। जरासंध ने काशी, कौशल, चेदद, मालवा, ववदेह, अंग, वंग, कमलंग, कश्मीर और गांधार राजाओंको पराजजत ककया। मथुरा शासक कं स ने अपनी बहन की शादी जरासंध से की तथा ब्रहद्रथ वंश की राजधानी वशुमनत या गगररव्रज या राजगृह को बनाई। भगवान श्रीकृ ठि की सहायता से पाण्डव पुर भीम ने जरासंध को द्वन्द युद्ध में मार ददया। उसके बाद उसके पुर सहदेव को शासक बनाया गया। इस वंश का अजन्तम राजा ररपुन्जय था। ररपुन्जय को उसके दरबारी मंरी पूमलक ने मारकर अपने पुर को राजा बना ददया। इसके बाद एक अन्य दरबारी ‘महीय’ ने पूमलक और उसके पुर की हत्या कर अपने पुर बबजम्बसार को गद्दी पर बैिाया। ईसा पूवव ६०० में ब्रहद्रथ वंश को समाप्त कर एक नये राजवंश की थथापना हुई। पुरािों के अनुसार मनु के पुर सुद्युम्न के पुर का ही नाम “गया" था। वैशाली के ललच्छवी बबहार में जथथत प्राचीन गिराज्यों में बुद्धकालीन समय में सबसे ब़िा तथा शक्नतशाली राज्य था। इस गिराज्य की थथापना सूयववंशीय राजा इश्वाकु के पुर ववशाल ने की थी, जो कालान्तर में ‘वैशाली’ के नाम से ववख्यात हुई।  महावग्ग जातक के अनुसार मलच्छवव वजज्जसंि का एक धनी समृद्धशाली नगर था। यहााँ अनेक सुन्दर भवन, चैत्य तथा ववहार थे।  मलच्छववयों ने महात्मा बुद्ध के ननवारि हेतु महावन में प्रमसद्ध कतागारशाला का ननमावि करवाया था।  राजा चेतक की पुरी चेलना का वववाह मगध नरेश बबजम्बसार से हुआ था।  ईसा पूवव ७वीं शती में वैशाली के मलच्छवव राजतन्र से गितन्र में पररवनतवत हो गया।  ववशाल ने वैशाली शहर की थथापना की। वैशामलका राजवंश का प्रथम शासक नमनेददठट था, जबकक अजन्तम राजा सुनत या प्रमानत था। इस राजवंश में २४ राजा हुए हैं। अलकप्प के बुलल यह प्राचीन गिराज्य बबहार के शाहाबाद, आरा और मुजफ्फरपुर जजलों के बीच जथथत था। बुमलयों का बैि द्वीप (बेनतया) के साथ िननठि सम्बन्ध था। बेनतया बुमलयों की राजधानी थी। बुमल लोग बौद्ध धमव के अनुयायी थे। बुद्ध की मृत्यु के पश्चात्उनके अवशेर् को प्राप्त कर एक थतूप का ननमावि करवाया था। हयवक वंश बबजम्बसार ने हयवक वंश की थथापना ५४४ ई. पू. में की। इसके साथ ही राजनीनतक शक्नत के रूप में बबहार का सववप्रथम उदय हुआ। बबजम्बसार को मगध साम्राज्य का वाथतववक संथथापक/राजा माना जाता है। बबजम्बसार ने गगररव्रज (राजगीर) को अपनी राजधानी बनायी। इसके वैवादहक सम्बन्धों (कौशल, वैशाली एवं पंजाब) की नीनत अपनाकर अपने साम्राज्य का ववथतार ककया। बबजम्बसार (५४४ ई. पू. से ४९२ ई. पू.)- बबजम्बसार एक कू टनीनतज्ञ और दूरदशी शासक था। उसने प्रमुख राजवंशों में वैवादहक सम्बन्ध थथावपत कर राज्य को फै लाया।
  3. 3. सबसे पहले उसने मलच्छवव गिराज्य के शासक चेतक की पुरी चेलना के साथ वववाह ककया। दूसरा प्रमुख वैवादहक सम्बन्ध कौशल राजा प्रसेनजीत की बहन महाकौशला के साथ वववाह ककया। इसके बाद भद्र देश की राजकु मारी िेमा के साथ वववाह ककया। महावग्ग के अनुसार बबजम्बसार की ५०० राननयााँ थीं। उसने अवंनत के शक्नतशाली राजा चन्द्र प्रद्योत के साथ दोथताना सम्बन्ध बनाया। मसन्ध के शासक रूद्रायन तथा गांधार के मुक्कु रगनत से भी उसका दोथताना सम्बन्ध था। उसने अंग राज्य को जीतकर अपने साम्राज्य में ममला मलया था वहााँ अपने पुर अजातशरु को उपराजा ननयुक्त ककया था। बबजम्बसार महात्मा बुद्ध का ममर और संरिक था। ववनयवपटक के अनुसार बुद्ध से ममलने के बाद उसने बौद्ध धमव को ग्रहि ककया, लेककन जैन और ब्राह्मि धमव के प्रनत उसकी सदहठिुता थी। बबजम्बसार ने करीब ५२ वर्ों तक शासन ककया। बौद्ध और जैन ग्रन्थानुसार उसके पुर अजातशरु ने उसे बन्दी बनाकर कारागार में डाल ददया था जहााँ उसका ४९२ ई. पू. में ननधन हो गया।  बबजम्बसार ने अपने ब़िे पुर “दशवक" को उत्तरागधकारी िोवर्त ककया था।  भारतीय इनतहास में बबजम्बसार प्रथम शासक था जजसने थथायी सेना रखी।  बबजम्बसार ने राजवैद्य जीवक को भगवान बुद्ध की सेवा में ननयुक्त ककया था।  बौद्ध मभिुओंको ननिःशुल्क जल यारा की अनुमनत दी थी।s  बबजम्बसार की हत्या महात्मा बुद्ध के ववरोधी देवव्रत के उकसाने पर अजातशरु ने की थी। आम्रपाली- यह वैशाली की नतवकी एवं परम रूपवती काम कला प्रवीि वेश्या थी। आम्रपाली के सौन्दयव पर मोदहत होकर बबजम्बसार ने मलच्छवव से जीतकर राजगृह में ले आया। उसके संयोग से जीवक नामक पुररत्न हुआ। बबजम्बसार ने जीवक को तिमशला में मशिा हेतु भेजा। यही जीवक एक प्रख्यात गचककत्सक एवं राजवैद्य बना। अजातशरु (४९२-४६० ई. पू.)- बबजम्बसार के बाद अजातशरु मगध के मसंहासन पर बैिा। इसके बचपन का नाम कु णिक था। वह अपने वपता की हत्या कर गद्दी पर बैिा। अजातशरु ने अपने वपता के साम्राज्य ववथतार की नीनत को चरमोत्कर्व तक पहुाँचाया। अजातशरु के मसंहासन ममलने के बाद वह अनेक राज्य संिर्व एवं कदिनाइयों से निर गया लेककन अपने बाहुबल और बुद्गधमानी से सभी पर ववजय प्राप्त की। महत्वाकांिी अजातशरु ने अपने वपता को कारागार में डालकर किोर यातनाएाँ दीं जजससे वपता की मृत्यु हो गई। इससे दुणखत होकर कौशल रानी की मृत्यु हो गई। कौशल संिर्व- बबजम्बसार की पत्नी (कौशल) की मृत्यु से प्रसेनजीत बहुत क्रोगधत हुआ और अजातशरु के णखलाफ संिर्व छे ़ि ददया। पराजजत प्रसेनजीत श्रावथती भाग गया लेककन दूसरे युद्ध-संिर्व में अजातशरु पराजजत हो गया लेककन प्रसेनजीत ने अपनी पुरी वाजजरा का वववाह कर काशी को दहेज में दे ददया। वजज्ज संि संिर्व- मलच्छवव राजकु मारी चेलना बबजम्बसार की पत्नी थी जजससे उत्पन्न दो पुरी हल्ल और बेहल्ल को उसने अपना हाथी और रत्नों का एक हार ददया था जजसे अजातशरु ने मनमुटाव के कारि वापस मााँगा। इसे चेलना ने अथवीकार कर ददया, फलतिः अजातशरु ने मलच्छववयों के णखलाफ युद्ध िोवर्त कर ददया। वथसकार से मलच्छववयों के बीच फू ट डालकर उसे पराजजत कर ददया और मलच्छवव अपने राज्य में ममला मलया। मल्ल संिर्व- अजातशरु ने मल्ल संि पर आक्रमि कर अपने अगधकार में कर मलया। इस प्रकार पूवी उत्तर प्रदेश के एक ब़िे भू-भाग मगध साम्राज्य का अंग बन गया।  अजातशरु ने अपने प्रबल प्रनतद्वन्दी अवजन्त राज्य पर आक्रमि करके ववजय प्राप्त की।
  4. 4.  अजातशरु धाममवक उदार सम्राट था। ववमभन्न ग्रन्थों के अनुसार वे बौद्ध और जैन दोनों मत के अनुयायी माने जाते हैं लेककन भरहुत थतूप की एक वेददका के ऊपर अजातशरु बुद्ध की वंदना करता हुआ ददखाया गया है।  उसने शासनकाल के आिवें वर्व में बुद्ध के महापररननवावि के बाद उनके अवशेर्ों पर राजगृह में थतूप का ननमावि करवाया और ४८३ ई. पू. राजगृह की सप्तपणिव गुफा में प्रथम बौद्ध संगीनत का आयोजन ककया। इस संगीनत में बौद्ध मभिुओंके सम्बजन्धत वपटकों को सुतवपटक और ववनयवपटक में ववभाजजत ककया।  मसंहली अनुश्रुनतयों के अनुसार उसने लगभग ३२ वर्ों तक शासन ककया और ४६० ई. पू. में अपने पुर उदयन द्वारा मारा गया था।  अजातशरु के शासनकाल में ही महात्मा बुद्ध ४८७ ई. पू. महापररननवावि तथा महावीर का भी ननधन ४६८ ई. पू. हुआ था। उदयन- अजातशरु के बाद ४६० ई. पू. मगध का राजा बना। बौद्ध ग्रन्थानुसार इसे वपतृहन्ता लेककन जैन ग्रन्थानुसार वपतृभक्त कहा गया है। इसकी माता का नाम पद्मावती था।  उदयन शासक बनने से पहले चम्पा का उपराजा था। वह वपता की तरह ही वीर और ववथतारवादी नीनत का पालक था।  इसने पाटमल पुर (गंगा और सोन के संगम) को बसाया तथा अपनी राजधानी राजगृह से पाटमलपुर थथावपत की।  मगध के प्रनतद्वन्दी राज्य अवजन्त के गुप्तचर द्वारा उदयन की हत्या कर दी गई। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार उदयन के तीन पुर अननरुद्ध, मंडक और नागदशक थे। उदयन के तीनों पुरों ने राज्य ककया। अजन्तम राजा नागदासक था। जो अत्यन्त ववलासी और ननबवल था। शासनतन्र में मशगथलता के कारि व्यापक असन्तोर् जनता में फै ला। राज्य ववद्रोह कर उनका सेनापनत मशशुनाग राजा बना। इस प्रकार हयवक वंश का अन्त और मशशुनाग वंश की थथापना ४१२ई.पू. हुई। लशशुनाग वंश मशशुनाग ४१२ई. पू.गद्दी पर बेि। महावंश के अनुसार वह मलच्छवव राजा के वेश्या पत्नी से उत्पन्न पुर था। पुरािों के अनुसार वह िबरय था। इसने सववप्रथम मगध के प्रबल प्रनतद्वन्दी राज्य अवजन्त को ममलाया। मगध की सीमा पश्गचम मालवा तक फै ल गई और वत्स को मगध में ममला ददया। वत्स और अवजन्त के मगध में ववलय से, पाटमलपुर को पश्गचमी देशों से, व्यापाररक मागव के मलए राथता खुल गया।  मशशुनाग ने मगध से बंगाल की सीमा से मालवा तक ववशाल भू-भाग पर अगधकार कर मलया।  मशशुनाग एक शक्नतशाली शासक था जजसने गगररव्रज के अलावा वैशाली नगर को भी अपनी राजधानी बनाया। ३९४ ई. पू. में इसकी मृत्यु हो गई। कालाशोक- यह मशशुनाग का पुर था जो मशशुनाग के ३९४ ई. पू. मृत्यु के बाद मगध का शासक बना। महावंश में इसे कालाशोक तथा पुरािों में काकविव कहा गया है। कालाशोक ने अपनी राजधानी को पाटमलपुर थथानान्तररत कर ददया था। इसने २८ वर्ों तक शासन ककया। कालाशोक के शासनकाल में ही बौद्ध धमव की द्ववतीय संगीनत का आयोजन हुआ।  बािभट्ट रगचत हर्वचररत के अनुसार काकविव को राजधानी पाटमलपुर में िूमते समय महापद्यनन्द नामक व्यक्नत ने चाकू मारकर हत्या कर दी थी। ३६६ ई. पू. कालाशोक की मृत्यु हो गई।  महाबोगधवंश के अनुसार कालाशोक के दस पुर थे, जजन्होंने मगध पर २२ वर्ों तक शासन ककया।  ३४४ ई. पू. में मशशुनाग वंश का अन्त हो गया और नन्द वंश का उदय हुआ।
  5. 5. नन्द वंश ३४४ ई. पू. में महापद्यनन्द नामक व्यक्नत ने नन्द वंश की थथापना की। पुरािों में इसे महापद्म तथा महाबोगधवंश में उग्रसेन कहा गया है। यह नाई जानत का था। उसे महापद्म एकारट, सवव िरान्तक आदद उपागधयों से ववभूवर्त ककया गया है। महापद्म नन्द के प्रमुख राज्य उत्तरागधकारी हुए हैं- उग्रसेन, पंडूक, पाण्डु गनत, भूतपाल, राठरपाल, योववर्ािक, दशमसद्धक, कै वतव, धनानन्द। इसके शासन काल में भारत पर आक्रमि मसकन्दर द्वारा ककया गया। मसकन्दर के भारत से जाने के बाद मगध साम्राज्य में अशाजन्त और अव्यवथथा फै ली। धनानन्द एक लालची और धन संग्रही शासक था, जजसे असीम शक्नत और सम्पवत्त के बावजूद वह जनता के ववश्वास को नहीं जीत सका। उसने एक महान ववद्वान ब्राह्मि चािक्य को अपमाननत ककया था।  चािक्य ने अपनी कू टनीनत से धनानन्द को पराजजत कर चन्द्रगुप्त मौयव को मगध का शासक बनाया।  महापद्मनन्द पहला शासक था जो गंगा िाटी की सीमाओंका अनतक्रमि कर ववन््य पववत के दक्षिि तक ववजय पताका लहराई।  नन्द वंश के समय मगध राजनैनतक दृजठट से अत्यन्त समृद्धशाली साम्राज्य बन गया।  व्याकरि के आचायव पाणिनी महापद्मनन्द के ममर थे।  वर्व, उपवर्व, वर, रुगच, कात्यायन जैसे ववद्वान नन्द शासन में हुए।  शाकटाय तथा थथूल भद्र धनानन्द के जैन मतावलम्बी अमात्य थे। मौयय राजवंश ३२२ ई. पू. में चन्द्रगुप्त मौयव ने अपने गुरू चािक्य की सहायता से धनानन्द की हत्या कर मौयव वंश की नींव डाली थी। चन्द्रगुप्त मौयव ने नन्दों के अत्याचार व िृणित शासन से मुक्नत ददलाई और देश को एकता के सूर में बााँधा और मौयव साम्राज्य की थथापना की। यह साम्राज्य गितन्र व्यवथथा पर राजतन्र व्यवथथा की जीत थी। इस कायव में अथवशाथर नामक पुथतक द्वारा चािक्य ने सहयोग ककया। ववठिुगुप्त व कौदटल्य उनके अन्य नाम हैं। आयों के आगमन के बाद यह प्रथम थथावपत साम्राज्य था। चन्द्रगुप्त मौयव (३२२ ई. पू. से २९८ ई. पू.)- चन्द्रगुप्त मौयव के जन्म वंश के सम्बन्ध में वववाद है। ब्राह्मि, बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में परथपर ववरोधी वववरि ममलता है। ववववध प्रमािों और आलोचनात्मक समीिा के बाद यह तकव ननधावररत होता है कक चन्द्रगुप्त मोररय वंश का िबरय था। चन्द्रगुप्त के वपता मोररय नगर प्रमुख थे। जब वह गभव में ही था तब उसके वपता की मृत्यु युद्धभूमम में हो गयी थी। उसका पाटमलपुर में जन्म हुआ था तथा एक गोपालक द्वारा पोवर्त ककया गया था। चरावाह तथा मशकारी रूप में ही राजा-गुि होने का पता चािक्य ने कर मलया था तथा उसे एक हजार में कर्ापवि में खरीद मलया। तत्पश्चात्तिमशला लाकर सभी ववद्या में ननपुि बनाया। अ्ययन के दौरान ही सम्भवतिः चन्द्रगुप्त मसकन्दर से ममला था। ३२३ ई. पू. में मसकन्दर की मृत्यु हो गयी तथा उत्तरी मसन्धु िाटी में प्रमुख यूनानी िरप कफमलप द्ववतीय की हत्या हो गई। जजस समय चन्द्रगुप्त राजा बना था भारत की राजनीनतक जथथनत बहुत खराब थी। उसने सबसे पहले एक सेना तैयार की और मसकन्दर के ववरुद्ध युद्ध प्रारम्भ ककया। ३१७ ई. पू. तक उसने सम्पूिव मसन्ध और पंजाब प्रदेशों पर अगधकार कर मलया। अब चन्द्रगुप्त मौयव मसन्ध तथा पंजाब का एकिर शासक हो गया। पंजाब और मसन्ध ववजय के बाद चन्द्रगुप्त तथा चािक्य ने धनानन्द का नाश करने हेतु मगध पर आक्रमि कर ददया। युद्ध में धनाननन्द मारा गया
  6. 6. अब चन्द्रगुप्त भारत के एक ववशाल साम्राज्य मगध का शासक बन गया। मसकन्दर की मृत्यु के बाद सेल्यूकस उसका उत्तरागधकारी बना। वह मसकन्दर द्वारा जीता हुआ भू-भाग प्राप्त करने के मलए उत्सुक था। इस उद्देश्य से ३०५ ई. पू. उसने भारत पर पुनिः चढाई की। चन्द्रगुप्त ने पश्गचमोत्तर भारत के यूनानी शासक सेल्यूकस ननके टर को पराजजत कर एररया (हेरात), अराकोमसया (कं धार), जेड्रोमसया पेरोपेननसडाई (काबुल) के भू-भाग को अगधकृ त कर ववशाल भारतीय साम्राज्य की थथापना की। सेल्यूकस ने अपनी पुरी हेलन का वववाह चन्द्रगुप्त से कर ददया। उसने मेगथथनीज को राजदूत के रूप में चन्द्रगुप्त मौयव के दरबार में ननयुक्त ककया। चन्द्रगुप्त मौयव ने पश्गचम भारत में सौराठर तक प्रदेश जीतकर अपने प्रत्यि शासन के अन्तगवत शाममल ककया। गगरनार अमभलेख (१५० ई. पू.) के अनुसार इस प्रदेश में पुण्यगुप्त वैश्य चन्द्रगुप्त मौयव का राज्यपाल था। इसने सुदशवन झील का ननमावि ककया। दक्षिि में चन्द्रगुप्त मौयव ने उत्तरी कनावटक तक ववजय प्राप्त की। चन्द्रगुप्त मौयव के ववशाल साम्राज्य में काबुल, हेरात, कन्धार, बलूगचथतान, पंजाब, गंगा-यमुना का मैदान, बबहार, बंगाल, गुजरात था तथा ववन््य और कश्मीर के भू-भाग सजम्ममलत थे, लेककन चन्द्रगुप्त मौयव ने अपना साम्राज्य उत्तर-पश्गचम में ईरान से लेकर पूवव में बंगाल तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिि में उत्तरी कनावटक तक ववथतृत ककया था। अजन्तम समय में चन्द्रगुप्त मौयव जैन मुनन भद्रबाहु के साथ श्रविबेलगोला चला गया था। २९८ ई. पू. में उपवास द्वारा चन्द्रगुप्त मौयव ने अपना शरीर त्याग ददया। बबन्दुसार (२९८ ई. पू. से २७३ ई. पू.)- यह चन्द्रगुप्त मौयव का पुर व उत्तरागधकारी था जजसे वायु पुराि में मद्रसार और जैन सादहत्य में मसंहसेन कहा गया है। यूनानी लेखक ने इन्हें अमभलोचेट्स कहा है। यह २९८ ई. पू. मगध साम्राज्य के मसंहासन पर बैिा। जैन ग्रन्थों के अनुसार बबन्दुसार की माता दुधवरा थी। थेरवाद परम्परा के अनुसार वह ब्राह्मि धमव का अनुयायी था। बबन्दुसार के समय में भारत का पश्गचम एमशया से व्यापाररक सम्बन्ध अच्छा था। बबन्दुसार के दरबार में सीररया के राजा एंनतयोकस ने डायमाइकस नामक राजदूत भेजा था। ममस्र के राजा टॉलेमी के काल में डाइनोमसयस नामक राजदूत मौयव दरबार में बबन्दुसार की राज्यसभा में आया था। ददव्यादान के अनुसार बबन्दुसार के शासनकाल में तिमशला में दो ववद्रोह हुए थे, जजनका दमन करने के मलए पहली बार अशोक को, दूसरी बार सुसीम को भेजा प्रशासन के िेर में बबन्दुसार ने अपने वपता का ही अनुसरि ककया। प्रनत में उपराजा के रूप में कु मार ननयुक्त ककए। ददव्यादान के अनुसार अशोक अवजन्त का उपराजा था। बबन्दुसार की सभा में ५०० सदथयों वाली मजन्रपररर्द् थी जजसका प्रधान खल्लाटक था। बबन्दुसार ने २५ वर्ों तक राज्य ककया अन्ततिः २७३ ई. पू. उसकी मृत्यु हो गयी। अशोक (२७३ ई. पू. से २३६ ई. पू.)- राजगद्दी प्राप्त होने के बाद अशोक को अपनी आन्तररक जथथनत सुदृढ करने में चार वर्व लगे। इस कारि राज्यारोहि चार साल बाद २६९ ई. पू. में हुआ था। वह २७३ ई. पू. में मसंहासन पर बैिा। अमभलेखों में उसे देवाना वप्रय एवं राजा आदद उपागधयों से सम्बोगधत ककया गया है। माथकी तथा गजवरा के लेखों में उसका नाम अशोक तथा पुरािों में उसे अशोक वधवन कहा गया है। मसंहली अनुश्रुनतयों के अनुसार अशोक ने ९९ भाइयों की हत्या करके राजमसंहासन प्राप्त ककया था, लेककन इस उत्तरागधकार के मलए कोई थवतंर प्रमाि प्राप्त नहीं हुआ है। ददव्यादान में अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी है, जो चम्पा के एक ब्राह्मि की पुरी थी।
  7. 7. मसंहली अनुश्रुनतयों के अनुसार उज्जनयनी जाते समय अशोक ववददशा में रुका जहााँ उसने श्रेठिी की पुरी देवी से वववाह ककया जजससे महेन्द्र और संिममरा का जन्म हुआ। ददव्यादान में उसकी एक पत्नी का नाम नतठयरक्षिता ममलता है। उसके लेख में के वल उसकी पत्नी का नाम करूिावकक है जो तीवर की माता थी। बौद्ध परम्परा एवं कथाओं के अनुसार बबन्दुसार अशोक को राजा नहीं बनाकर सुसीम को मसंहासन पर बैिाना चाहता था, लेककन अशोक एवं ब़िे भाई सुसीम के बीच युद्ध की चचाव है। अशोक का कललंग युद्ध अशोक ने अपने राज्यामभर्ेक के ८वें वर्व २६१ ई. पू. में कमलंग पर आक्रमि ककया था। आन्तररक अशाजन्त से ननपटने के बाद २६९ ई. पू. में उसका ववगधवत्अमभर्ेक हुआ। तेरहवें मशलालेख के अनुसार कमलंग युद्ध में एक लाख ५० हजार व्यक्नत बन्दी बनाकर ननवावमसत कर ददए गये, एक लाख लोगों की हत्या कर दी गयी। सम्राट अशोक ने भारी नरसंहार को अपनी आाँखों से देखा। इससे द्रववत होकर अशोक ने शाजन्त, सामाजजक प्रगनत तथा धाममवक प्रचार ककया। कमलंग युद्ध ने अशोक के हृदय में महान पररवतवन कर ददया। उसका हृदय मानवता के प्रनत दया और करुिा से उद्वेमलत हो गया। उसने युद्ध कक्रयाओंको सदा के मलए बन्द कर देने की प्रनतज्ञा की। यहााँ से आ्याजत्मक और धम्म ववजय का युग शुरू हुआ। उसने बौद्ध धमव को अपना धमव थवीकार ककया। मसंहली अनुश्रुनतयों दीपवंश एवं महावंश के अनुसार अशोक को अपने शासन के चौदहवें वर्व में ननगोथ नामक मभिु द्वारा बौद्ध धमव की दीिा दी गई थी। तत्पश्चात्मोगाली पुर ननथस के प्रभाव से वह पूिवतिः बौद्ध हो गया था। ददव्यादान के अनुसार अशोक को बौद्ध धमव में दीक्षित करने का श्रेय उपगुप्त नामक बौद्ध मभिुक को जाता है। अपने शासनकाल के दसवें वर्व में सववप्रथम बोधगया की यारा की थी। तदुपरान्त अपने राज्यामभर्ेक के बीसवें वर्व में लुजम्बनी की यारा की थी तथा लुजम्बनी ग्राम को करमुक्त िोवर्त कर ददया था। अशोक एवं बौद्ध धमय  कमलंग के युद्ध के बाद अशोक ने व्यक्नतगत रूप से बौद्ध धमव अपना मलया।  अशोक के शासनकाल में ही पाटमलपुर में तृतीय बौद्ध संगीनत का आयोजन ककया गया, जजसकी अ्यिता मोगाली पुर नतठया ने की। इसी में अमभधम्मवपटक की रचना हुई और बौद्ध मभिु ववमभन्न देशों में भेजे गये जजनमें अशोक के पुर महेन्द्र एवं पुरी संिममरा को श्रीलंका भेजा गया।  ददव्यादान में उसकी एक पत्नी का नाम नतठयरक्षिता ममलता है। उसके लेख में के वल उसकी पत्नी करूिावकक है। ददव्यादान में अशोक के दो भाइयों सुसीम तथा ववगताशोक का नाम का उल्लेख है।  ववद्वानों अशोक की तुलना ववश्व इनतहास की ववभूनतयााँ कांथटेटाइन, ऐटोननयस, अकबर, सेन्टपॉल, नेपोमलयन सीजर के साथ की है। अशोक ने अदहंसा, शाजन्त तथा लोक कल्यािकारी नीनतयों के ववश्वववख्यात तथा अतुलनीय सम्राट हैं। एच. जी. वेल्स के अनुसार अशोक का चररर “इनतहास के थतम्भों को भरने वाले राजाओं, सम्राटों, धमावगधकाररयों, सन्त-महात्माओं आदद के बीच प्रकाशमान है और आकाश में प्रायिः एकाकी तारा की तरह चमकता है।"  अशोक ने बौद्ध धमव को अपना मलया और साम्राज्य के सभी साधनों को जनता के कल्याि हेतु लगा ददया। अशोक ने बौद्ध धमव के प्रचार के मलए ननम्नमलणखत साधन अपनाये-
  8. 8. (अ) धमवयाराओं का प्रारम्भ, (ब) राजकीय पदागधकाररयों की ननयुक्नत, (स) धमव महापारों की ननयुक्नत, (द) ददव्य रूपों का प्रदशवन, (य) धमव श्रावि एवं धमोपदेश की व्यवथथा, (र) लोकाचाररता के कायव, (ल) धमवमलवपयों का खुदवाना, (ह) ववदेशों में धमव प्रचार को प्रचारक भेजना आदद। अशोक ने बौद्ध धमव का प्रचार का प्रारम्भ धमवयाराओं से ककया। वह अमभर्ेक के १०वें वर्व बोधगया की यारा पर गया। कमलंग युद्ध के बाद आमोद-प्रमोद की याराओं पर पाबन्दी लगा दी। अपने अमभर्ेक २०वें वर्व में लुजम्बनी ग्राम की यारा की। नेपाल तराई में जथथत ननगलीवा में उसने कनकमुनन के थतूप की मरम्मत करवाई। बौद्ध धमव के प्रचार के मलए अपने साम्राज्य के उच्च पदागधकाररयों को ननयुक्त ककया। थतम्भ लेख तीन और सात के अनुसार उसने व्युठट, रज्जुक, प्रादेमशक तथा युक्त नामक पदागधकाररयों को जनता के बीच जाकर धमव प्रचार करने और उपदेश देने का आदेश ददया। अमभर्ेक के १३वें वर्व के बाद उसने बौद्ध धमव प्रचार हेतु पदागधकाररयों का एक नया वगव बनाया जजसे धमव महापार कहा गया था। इसका कयव ववमभन्न धाममवक सम्प्रदायों के बीच द्वेर्भाव को ममटाकर धमव की एकता थथावपत करना था। अशोक के लशलालेख अशोक के १४ मशलालेख ववमभन्न लेखों का समूह है जो आि मभन्न-मभन्न थथानों से प्राप्त ककए गये हैं- (१) धौली- यह उ़िीसा के पुरी जजला में है। (२) शाहबाज गढी- यह पाककथतान (पेशावर) में है। (३) मान सेहरा- यह हजारा जजले में जथथत है। (४) कालपी- यह वतवमान उत्तरांचल (देहरादून) में है। (५) जौगढ- यह उ़िीसा के जौगढ में जथथत है। (६) सोपरा- यह महराठर के थािे जजले में है। (७) एरागुडड- यह आन्र प्रदेश के कु नूवल जजले में जथथत है। (८) गगरनार- यह कादियाबा़ि में जूनागढ के पास है। अशोक के लघु लशलालेख अशोक के लिु मशलालेख चौदह मशलालेखों के मुख्य वगवमें सजम्ममलत नहीं है जजसे लिु मशलालेख कहा जाता है। ये ननम्नांककत थथानों से प्राप्त हुए हैं- (१) रूपनाथ- यह म्य प्रदेश के जबलपुर जजले में है। (२) गुजरी- यह म्य प्रदेश के दनतया जजले में है। (३) भबू- यह राजथथान के जयपुर जजले में है।
  9. 9. (४) माथकी- यह रायचूर जजले में जथथत है। (५) सहसराम- यह बबहार के शाहाबाद जजले में है। धम्म को लोकवप्रय बनाने के मलए अशोक ने मानव व पशु जानत के कल्याि हेतु पशु-पक्षियों की हत्या पर प्रनतबन्ध लगा ददया था। राज्य तथा ववदेशी राज्यों में भी मानव तथा पशु के मलए अलग गचककत्सा की व््वथथा की। अशोक के महान पुण्य का कायव एवं थवगव प्राजप्त का उपदेश बौद्ध ग्रन्थ संयुक्त ननकाय में ददया गया है। अशोक ने दूर-दूर तक बौद्ध धमव के प्रचार हेतु दूतों, प्रचारकों को ववदेशों में भेजा अपने दूसरे तथा १३वें मशलालेख में उसने उन देशों का नाम मलखवाया जहााँ दूत भेजे गये थे। दक्षिि सीमा पर जथथत राज्य चोल, पाण््य, सनतययुक्त के रल पुर एवं ताम्रपाणिव बताये गये हैं। अशोक के अलिलेख अशोक के अमभलेखों में शाहनाज गढी एवं मान सेहरा (पाककथतान) के अमभलेख खरोठिी मलवप में उत्कीिव हैं। तिमशला एवं लिमान (काबुल) के समीप अफगाननथतान अमभलेख आरमाइक एवं ग्रीक में उत्कीिव हैं। इसके अनतररक्त अशोक के समथत मशलालेख लिुमशला थतम्भ लेख एवं लिु लेख ब्राह्मी मलवप में उत्कीिव हैं। अशोक का इनतहास भी हमें इन अमभलेखों से प्राप्त होता है। अभी तक अशोक के ४० अमभलेख प्राप्त हो चुके हैं। सववप्रथम १८३७ ई. पू. में जेम्स वप्रंसेप नामक ववद्वान ने अशोक के अमभलेख को पढने में सफलता हामसल की थी। रायपुरबा- यह भी बबहार राज्य के चम्पारि जजले में जथथत है। प्रयाग- यह पहले कौशाम्बी में जथथत था जो बाद में मुगल सम्राट अकबर द्वारा इलाहाबाद के ककले में रखवाया गया था। अशोक के लघु स्तम्ि लेख सम्राट अशोक की राजकीय िोर्िाएाँ जजन थतम्भों पर उत्कीिव हैं उन्हें लिु थतम्भ लेख कहा जाता है जो ननम्न थथानों पर जथथत हैं- १. सांची- म्य प्रदेश के रायसेन जजले में है। २. सारनाथ- उत्तर प्रदेश के वारािसी जजले में है। ३. रूजभ्मनदेई- नेपाल के तराई में है। ४. कौशाम्बी- इलाहाबाद के ननकट है। ५. ननग्लीवा- नेपाल के तराई में है। ६. ब्रह्मगगरर- यह मैसूर के गचबल दुगव में जथथत है। ७. मसद्धपुर- यह ब्रह्मगगरर से एक मील उ. पू. में जथथत है।
  10. 10. ८. जनतंग रामेश्वर- जो ब्रह्मगगरर से तीन मील उ. पू. में जथथत है। ९. एरागुडड- यह आन्र प्रदेश के कू नुवल जजले में जथथत है। १०. गोववमि- यह मैसूर के कोपवाय नामक थथान के ननकट है। ११. पालककगुण्क- यह गोववमि की चार मील की दूरी पर है। १२. राजूल मंडागगरर- यह आन्र प्रदेश के कू नुवल जजले में जथथत है। १३. अहरौरा- यह उत्तर प्रदेश के ममजावपुर जजले में जथथत है। १४. सारो-मारो- यह म्य प्रदेश के शहडोल जजले में जथथत है। १५. नेतुर- यह मैसूर जजले में जथथत है। अशोक के गुहा लेख दक्षिि बबहार के गया जजले में जथथत बराबर नामक तीन गुफाओंकी दीवारों पर अशोक के लेख उत्कीिव प्राप्त हुए हैं। इन सभी की भार्ा प्राकृ त तथा ब्राह्मी मलवप में है। के वल दो अमभलेखों शाहवाजगढी तथा मान सेहरा की मलवप ब्राह्मी न होकर खरोठिी है। यह मलवप दायीं से बायीं और मलखी जाती है। तिमशला से आरमाइक मलवप में मलखा गया एक भग्न अमभलेख कन्धार के पास शारे-कु ना नामक थथान से यूनानी तथा आरमाइक द्ववभार्ीय अमभलेख प्राप्त हुआ है। अशोक के स्तम्ि लेख अशोक के थतम्भ लेखों की संख्या सात है जो छिः मभन्न थथानों में पार्ाि थतम्भों पर उत्कीिव पाये गये हैं। इन थथानों के नाम हैं- (१) ददल्ली तोपरा- यह थतम्भ लेख प्रारंभ में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जजले में पाया गया था। यह म्य युगीन सुल्तान कफरोजशाह तुगलक द्वारा ददल्ली लाया गया। इस पर अशोक के सातों अमभलेख उत्कीिव हैं। (२) ददल्ली मेरि- यह थतम्भ लेख भी पहले मेरि में था जो बाद में कफरोजशाह द्वारा ददल्ली लाया गया। (३) लौररया अरराज तथा लौररया नन्दगढ- यह थतम्भ लेख बबहार राज्य के चम्पारि जजले में है। सैन्य व्यवथथा- सैन्य व्यवथथा छिः सममनतयों में ववभक्त सैन्य ववभाग द्वारा ननददवठट थी। प्रत्येक सममनत में पााँच सैन्य ववशेर्ज्ञ होते थे। पैदल सेना, अश्व सेना, गज सेना, रथ सेना तथा नौ सेना की व्यवथथा थी। सैननक प्रबन्ध का सवोच्च अगधकारी अन्तपाल कहलाता था। यह सीमान्त िेरों का भी व्यवथथापक होता था। मेगथथनीज के अनुसार चन्द्रगुप्त मौयव की सेना छिः लाख पैदल, पचास हजार अश्वारोही, नौ हजार हाथी तथा आि सौ रथों से सुसजज्जत अजेय सैननक थे।
  11. 11. प्रान्तीय प्रशासन चन्द्रगुप्त मौयव ने शासन संचालन को सुचारु रूप से चलाने के मलए चार प्रान्तों में ववभाजजत कर ददया था जजन्हें चक्र कहा जाता था। इन प्रान्तों का शासन सम्राट के प्रनतननगध द्वारा संचामलत होता था। सम्राट अशोक के काल में प्रान्तों की संख्या पााँच हो गई थी। ये प्रान्त थे- प्रान्त राजधानी प्राची (म्य देश)- पाटमलपुर उत्तरापथ - तिमशला दक्षििापथ - सुविवगगरर अवजन्त राठर - उज्जनयनी कमलंग - तोलायी प्रान्तों (चक्रों) का प्रशासन राजवंशीय कु मार (आयव पुर) नामक पदागधकाररयों द्वारा होता था। कु माराभाठय की सहायता के मलए प्रत्येक प्रान्त में महापार नामक अगधकारी होते थे। शीर्व पर साम्राज्य का के न्द्रीय प्रभाग तत्पश्चात्प्रान्त आहार (ववर्य) में ववभक्त था। ग्राम प्रशासन की ननम्न इकाई था, १०० ग्राम के समूह को संग्रहि कहा जाता था। आहार ववर्यपनत के अधीन होता था। जजले के प्रशासननक अगधकारी थथाननक था। गोप दस गााँव की व्यवथथा करता था। नगर प्रशासन मेगथथनीज के अनुसार मौयव शासन की नगरीय प्रशासन छिः सममनत में ववभक्त था। प्रथम सममनत- उद्योग मशल्पों का ननरीिि करता था। द्ववतीय सममनत- ववदेमशयों की देखरेख करता है। तृतीय सममनत- जनगिना। चतुथव सममनत- व्यापार वाणिज्य की व्यवथथा। पंचम सममनत- ववक्रय की व्यवथथा, ननरीिि। र्ठि सममनत- बबक्री कर व्यवथथा। नगर में अनुशासन बनाये रखने के मलए तथा अपराधों पर ननयन्रि रखने हेतु पुमलस व्यवथथा थी जजसे रक्षित कहा जाता था।
  12. 12. यूनानी थरोतों से ज्ञात होता है कक नगर प्रशासन में तीन प्रकार के अगधकारी होते थे-एग्रोनोयोई (जजलागधकारी), एण्टीनोमोई (नगर आयुक्त), सैन्य अगधकार। अशोक के परवती मौयव सम्राट- मगध साम्राज्य के महान मौयव सम्राट अशोक की मृत्यु २३७-२३६ ई. पू. में (लगभग) हुई थी। अशोक के उपरान्त अगले पााँच दशक तक उनके ननबवल उत्तरागधकारी शासन संचामलत करते रहे। अशोक के उत्तरागधकारी- जैन, बौद्ध तथा ब्राह्मि ग्रन्थों में अशोक के उत्तरागधकाररयों के शासन के बारे में परथपर ववरोधी ववचार पाये जाते हैं। पुरािों में अशोक के बाद ९ या १० शासकों की चचाव है, जबकक ददव्यादान के अनुसार ६ शासकों ने असोक के बाद शासन ककया। अशोक की मृत्यु के बाद मौयव साम्राज्य पश्गचमी और पूवी भाग में बाँट गया। पश्गचमी भाग पर कु िाल शासन करता था, जबकक पूवी भाग पर सम्प्रनत का शासन था लेककन १८० ई. पू. तक पश्गचमी भाग पर बैजक्रया यूनानी का पूिव अगधकार हो गया था। पूवी भाग पर दशरथ का राज्य था। वह मौयव वंश का अजन्तम शासक है। मौयय साम्राज्य का पतन मौयव सम्राट की मृत्यु (२३७-२३६ई. पू.) के उपरान्त करीबन दो सददयों (३२२-१८४ई.पू.) से चले आ रहे शक्नतशाली मौयव साम्राज्य का वविटन होने लगा। अजन्तम मौयव सम्राट वृहद्रथ की हत्या उसके सेनापनत पुठयममर ने कर दी। इससे मौयव साम्राज्य समाप्त हो गया। इसके पतन के कारि ननम्न हैं- १.अयोग्य एवं ननबवल उत्तरागधकारी,२.प्रशासन का अत्यगधक के न्द्रीयकरि,३.राठरीय चेतना का अभाव, ४.आगथवक एवं सांथकृ नतक असमानताएाँ ५.प्रान्तीय शासकों के अत्याचार,६.करों की अगधकता। ववमभन्न इनतहासकारों ने मौयव वंश का पतन के मलए मभन्न-मभन्न कारिों का उल्लेख ककया है-  हर प्रसाद शाथरी - धाममवक नीनत (ब्राह्मि ववरोधी नीनत के कारि)  हेमचन्द्र राय चौधरी - सम्राट अशोक की अदहंसक एवं शाजन्तवप्रय नीनत।  डी. डी.कौशाम्बी- आगथवक संकटग्रथत व्यवथथा का होना।  डी.एन.झा-ननबवल उत्तरागधकारी  रोममला थापर - मौयव साम्राज्य के पतन के मलए के न्द्रीय शासन अगधकारी तन्र का अव्यवथथा एवं अप्रमशक्षित होना। मौयव शासन - भारत में सववप्रथम मौयव वंश के शासनकाल में ही राठरीय राजनीनतक एकता थथावपत हुइ थी। मौयव प्रशासन में सत्ता का सुदृढ के न्द्रीयकरि था परन्तु राजा ननरंकु श नहीं होता था। मौयव काल में गितन्र का ह्रास हुआ और राजतन्रात्मक व्यवथथा सुदृढ हुई। कौदटल्य ने राज्य सप्तांक मसद्धान्त ननददवठट ककया था, जजनके आधार पर मौयव प्रशासन और उसकी गृह तथा ववदेश नीनत संचामलत होती थी -राजा, अमात्य जनपद, दुगव, कोर्, सेना और, ममर। शुंग राजवंश पुठयममर शुंग- मौयव साम्राज्य के अजन्तम शासक वृहद्रथ की हत्या करके १८४ई.पू. में पुठयममर ने मौयव साम्राज्य के राज्य पर अगधकार कर मलया। जजस नये राजवंश की थथापना की उसे पूरे देश में शुंग राजवंश के नाम से जाना जाता है। शुंग ब्राह्मि थे। बौद्ध धमव के प्रचार-प्रसार के फ़लथवरुप अशोक द्वारा यज्ञों पर रोक लगा ददये जाने के बाद उन्होंने
  13. 13. पुरोदहत का कमव त्यागकर सैननक वृनत को अपना मलया था। पुठयममर अजन्तम मौयव शासक वृहद्रथ का प्रधान सेनापनत था। पुठयममर शुंग के पश्चात इस वंश में नौ शासक और हुए जजनके नाम थे -अजग्नममर, वसुज्येठि, वसुममर, भद्रक, तीन अज्ञात शासक, भागवत और देवभूनत। एक ददन सेना का ननररिि करते समय वृह््थ की धोखे से हत्या कर दी। उसने ‘सेनानी’ की उपागध धारि की थी। दीिवकाल तक मौयों की सेना का सेनापनत होने के कारि पुठयममर इसी रुप में ववख्यात था तथा राजा बन जाने के बाद भी उसने अपनी यह उपागध बनाये रखी। शुंग काल में संथकृ त भार्ा का पुनरुत्थान हुआ था मनुथमृनत के वतवमान थवरुप की रचना इसी युग में हुई थी। अतिः उसने ननथसंदेह राजत्व को प्राप्त ककया था। परवती मौयों के ननबवल शासन में मगध का सरकारी प्रशासन तन्र मशगथल प़ि गया था एवं देश को आन्तररक एवं बाह्य संकटों का खतरा था। ऐसी ववकट जथथनत में पुठय ममर शुंग ने मगध साम्राज्य पर अपना अगधकार जमाकर जहााँ एक ओर यवनों के आक्रमि से देश की रिा की और देश में शाजन्त और व्यवथथा की थथापना कर वैददक धमव एवं आदेशों की जो अशोक के शासनकाल में अपेक्षित हो गये थे। इसी कारि इसका काल वैददक प्रनतकक्रया अथवा वैददक पुनजावगरि का काल कहलाता है। शुंग वंश के अजन्तम सम्राट देवभूनत की हत्या करके उसके सगचव वसुदेव ने ७५ ई. पू. कण्व वंश की नींंंव डाली। शुंगकालीन संथकृ नत के प्रमुख तथ्य  शुंग राजाओंका काल वैददक अथवा ब्राह्मि धमव का पुनजावगरि काल माना जाता है।  मानव आकृ नतयों के अंकन में कु शलता ददखायी गयी है। एक गचर में गरुङ सूयव तथा दूसरे में श्रीलक्ष्मी का अंकन अत्यन्त कलापूिव है।  पुठयममर शुंग ने ब्राह्मि धमव का पुनरुत्थान ककया। शुंग के सवोत्तम थमारक थतूप हैं।  बोधगया के ववशाल मजन्दर के चारों और एक छोटी पार्ाि वेददका ममली है। इसका ननमावि भी शुंगकाल में हुआ था। इसमें कमल, राजा, रानी, पुरुर्, पशु, बोगधवृि, छ्त्र, बररत्न, कल्पवृि, आदद प्रमुख हैं।  थविव मुद्रा ननठक, ददनार, सुविव, माबरक कहा जाता था। तााँबे के मसक्के कार्ापवि कहलाते थे। चााँदी के मसक्के के मलए ‘पुराि’अथवा ‘धारि’ शब्द आया है।  शुंग काल में समाज में बाल वववाह का प्रचलन हो गया था। तथा कन्याओंका वववाह आि से १२ वर्व की आयु में ककया जाने लगा था।  शुंग राजाओंका काल वैददक काल की अपेिा एक ब़िे वगव के लोगों के मजथतठक परम्परा, संथकृ नत एवं ववचारधारा को प्रनतबबजम्बत कर सकने में अगधक समथव है।  शुंग काल के उत्कृ ठट नमूने बबहार के बोधगया से प्राप्त होते हैं। भरहुत, सांची, बेसनगर की कला भी उत्कृ ठट है।  महाभाठय के अलावा मनुथमृनत का मौजूदा थवरुप सम्भवतिः इसी युग में रचा गया था। ववद्वानो के अनुसार शुंग काल में ही महाभारत के शाजन्तपूिव तथा अश्वमेध का भी पररवतवन हुआ। माना जाता है की पुठयममर ने बौद्ध धमाववलजम्बयों पर बहुत अत्याचार ककया, लेककन सम्भवतिः इसका कारि बौद्धों द्वारा ववदेशी आक्रमि अथावत यवनों की मदद करना था। पुठयममर ने अशोक द्वारा ननमावि करवाये गये ८४ हजार थतूपों को नठट करवाया। बौद्ध ग्रन्थ ददव्यावदान के अनुसार यह भी सच है कक उसने कु छ बौद्धों को अपना मन्री ननयुक्त कर रखा था। पुरािों के अनुसार पुठयममर ने ३६ वर्ों तक शासन ककया। इस प्रकार उसका काल ई.पू से १४८ई.पू.तक माना जाता है। पुष्यलमत्र के उत्तराधधकारी अजग्नममर- पुठयममर की मृत्यु (१४८इ.पू.) के पश्चात उसका पुर अजग्नममर शुंग वंश का राजा हुआ। वह ववददशा का उपराजा था। उसने कु ल ८ वर्ों तक शासन कीया।
  14. 14. वसुज्येठि या सुज्येठि - अजग्नममर के बाद वसुज्येठि राजा हुआ। वसुममर - शुंग वंश का चौथा राजा वसुममर हुआ। उसने यवनों को पराजजत ककया था। एक ददन नृत्य का आनन्द लेते समय मूजदेव नामक व्यक्नत ने उसकी हत्या कर दी। उसने १० वर्ों तक शाशन ककय। वसुममर के बाद भद्रक, पुमलंदक, िोर् तथा कफर वज्रममर क्रमशिः राजा हुए। इसके शाशन के १४वें वर्व में तिमशला के यवन नरेश एंटीयालकी्स का राजदूत हेमलयोंडोरस उसके ववददशा जथथत दरबार में उपजथथत हुआ था। वह अत्यन्त ववलासी शाशक था। उसके अमात्य वसुदेव ने उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार शुंग वंश का अन्त हो गया। महत्व- इस वंश के राजाओंने मगध साम्रज्य के के न्द्रीय भाग की ववदेमशयों से रिा की तथा म्य भारत में शाजन्त और सुव्यव्थथा की थथापना कर ववके न्द्रीकरि की प्रवृवत्त को कु छ समय तक रोके रखा। मौयव साम्राज्य के ्वंसावशेर्ों पर उन्होंने वैददक संथकृ नत के आदशों की प्रनतठिा की। यही कारि है की उसका शासनकाल वैददक पुनजावगरि का काल माना जाता है। ववदभव युद्ध- मालववकाममरम के अनुसार पुठयममर के काल में लगभग १८४इ.पू.में ववदभव युद्ध में पुठयममर की ववजय हुई और राज्य दो भागों में ब ददया गया। वर्ाव नदी दोनों राज्यों कीं सीमा मान ली गई। दोनो भागों के नरेश ने पुठयममर को अपना सम्राट मान मलया तथा इस राज्य का एक भाग माधवसेन को प्राप्त हुआ। पुठयममर का प्रभाव िेर नमवदा नदी के दक्षिि तक ववथतृत हो गया। यवनों का आक्रमि - यवनों को म्य देश से ननकालकर मसन्धु के ककनारे तक खदेङ ददया और पुठयममर के हाथों सेनापनत एवं राजा के रुप में उन्हें पराजजत होना पङा। यह पुठयममर के काल की सबसे महत्वपूिव िटना थी। पुठयममर का शासन प्रबन्ध- साम्राज्य की राजधानी पाटमलपुर थी। पुठयममर प्राचीन मौयव साम्राज्य के म्यवती भाग को सुरक्षित रख सकने में सफ़ल रहा। पुठयममर का साम्राज्य उत्तर में दहमालय से लेकर दक्षिि में बरार तक तथा पश्गचम में पंजाब से लेकर पूवव में मगध तक फ़ै ला हुआ था। ददव्यावदान और तारानाथ के अनुसार जालन्धर और थयालकोट पर भी उसका अगधकार था। साम्राज्य के ववमभन्न भागों में राजकु मार या राजकु ल के लोगो को राज्यपाल ननयुक्त करने की परम्परा चलती रही। पुठयममर ने अपने पुरों को साम्राज्य के ववमभन्न िेरों में सह -शाशक ननयुक्त कर रखा था। और उसका पुर अजग्नममर ववददशा का उपराजा था। धनदेव कौशल का राज्यपाल था। राजकु मार जी सेना के संचालक भी थे। इस समय भी ग्राम शासन की सबसे छोटी इकाई होती थी। इस काल तक आते-आते मौयवकालीन के न्द्रीय ननयन्रि में मशगथलता आ गयी थी तथा सामंतीकरि की प्रवृवत्त सकक्रय होने लगी थीं। कण्व राजवंश शुंग वंश के अजन्तम शासक देवभूनत के मजन्र वसुदेव ने उसकी हत्या कर सत्ता प्राप्त कर कण्व वंश की थथापना की। कण्व वंश ने ७५इ.पू. से ३०इ.पू. तक शासन ककया। वसुदेव पाटमलपुर के कण्व वंश का प्रवतवक था। वैददक धमव एवं संथकृ नत संरिि की जो परम्परा शुंगो ने प्रारम्भ की थी। उसे कण्व वंश ने जारी रखा। इस वंश का अजन्तम सम्राट सुशमी कण्य अत्यन्त अयोग्य और दुबवल था। और मगध िेर संकु गचत होने लगा। कण्व वंश का साम्राज्य बबहार, पूवी उत्तर प्रदेश तक सीममत हो गया और अनेक प्रान्तों ने अपने को थवतन्र िोवर्त कर ददया तत्पश्चात उसका पुर नारायि और अन्त में सुशमी जजसे सातवाहन वंश के प्रवतवक मसमुक ने पदच्युत कर ददया था। इस वंश के चार राजाओं ने ७५इ.पू.से ३०इ.पू.तक शासन ककया। आन्र व कु षाण वंश
  15. 15. मगध में आन्रों का शासन था या नहीं ममलती है। कु र्ािकालीन अवशेर् भी बबहार से अनेक थथानों से प्राप्त हुए हैं। कु छ समय के पश्चात प्रथम सदी इ. में इस िेर में कु र्ािों का अमभयान हुआ। कु र्ाि शासक कननठक द्वारा पाटमलपुर पर आक्रमि ककये जाने और यह के प्रमसद्ध बौद्ध ववद्वान अश्विोर् को अपने दरबार में प्रश्रय देने की चचाव ममलती है। कु र्ाि साम्राज्य के पतन के बाद मगध पर मलच्छववयों का शासन रहा। अन्य ववद्वान मगध पर शक मुण्डों का शासन मानते हैं। गुप्त साम्राज्य (गुप्तकालीन बबहार) मौयव वंश के पतन के बाद दीिवकाल तक भारत में राजनीनतक एकता थथावपत नहीं रही। कु र्ाि एवं सातवाहनों ने राजनीनतक एकता लाने का प्रयास ककया।  मौयोत्तर काल के उपरान्त तीसरी शताब्दी इ. में तीन राजवंशो का उदय हुआ जजसमें म्य भारत में नाग शक्नत, दक्षिि में बाकाटक तथा पूवी में गुप्त वंश प्रमुख हैं।  मौयव वंश के पतन के पश्चात नठट हुई राजनीनतक एकता को पुनथथावपत करने का श्रेय गुप्त वंश को है।  गुप्त साम्राज्य की नींव तीसरी शताब्दी के चौथे दशक में तथा उत्थान चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ। गुप्त वंश का प्रारजम्भक राज्य आधुननक उत्तर प्रदेश और बबहार में था। गुप्त वंश की स्थापना गुप्त राजवंश की थथापना महाराजा गुप्त ने लगभग २७५ई.में की थी। उनका वाथतववक नाम श्रीगुप्त था। गुप्त अमभलेखों से ज्ञात होता है कक चन्द्रगुप्त प्रथम का पुर िटोत्कच था। चन््गुप्त के मसंहासनारोहि के अवसर पर (३०२ई.) को गुप्त सम्वत भी कहा गया है। चीनी यारी इजत्संग के अनुसार मगध के मृग मशखावन में एक मजन्दर का ननमावि करवाया था। तथा मजन्दर के व्यय में २४ गााँव को दान ददये थे। श्रीगुप्त के समय में महाराजा की उपागध सामन्तों को प्रदान की जाती थी, अतिः श्रीगुप्त ककसी के अधीन शासक था। प्रमसद्ध इनतहासकार के . पी. जायसवाल के अनुसार श्रीगुप्त भारमशवों के अधीन छोटे से राज्य प्रयाग का शासक था। िटोत्कच- िटोत्कच श्रीगुप्त का पुर था। २८० ई. पू. से ३२० ई. तक गुप्त साम्राज्य का शासक बना रहा। इसने भी महाराजा की उपागध धारि की थी। चन्द्रगुप्त प्रथम- यह िटोत्कच का उत्तरागधकारी था, जो ३२० ई. में शासक बना।  चन्द्रगुप्त गुप्त वंशावली में सबसे पहला शासक था जो प्रथम थवतन्र शासक है। यह ववदेशी को ववद्रोह द्वारा हटाकर शासक बना।  इसने नवीन सम्वत (गुप्त सम्वत) की थथापना की। इसने मलच्छवव वंश की राजकु मारी कु मार देवी से वववाह सम्बन्ध थथावपत ककया।  चन्द्रगुप्त प्रथम के शासनकाल को भारतीय इनतहास का थविव युग कहा जाता है। इसने महाराजागधराज की उपागध धारि की थी। बाद में मलच्छवव को अपने साम्राज्य में सजम्ममलत कर मलया। इसका शासन काल (३२० ई. से ३५० ई. तक) था।  पुरािों तथा प्रयाग प्रशजथत से चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्य के ववथतार के ववर्य में जानकारी ममलती है। चन्द्रगुप्त प्रथम तथा मलच्छवव सम्बन्ध
  16. 16. चन्द्रगुप्त प्रथम ने मलच्छवव के साथ वैवादहक सम्बन्ध थथावपत ककया। वह एक दूरदशी सम्राट था। चन्द्रगुप्त ने मलच्छववयों के सहयोग और समथवन पाने के मलए उनकी राजकु मारी कु मार देवी के साथ वववाह ककया। जथमथ के अनुसार इस वैवादहक सम्बन्ध के पररिामथवरूप चन्द्रगुप्त ने मलच्छववयों का राज्य प्राप्त कर मलया तथा मगध उसके सीमावती िेर में आ गया। कु मार देवी के साथ वववाह-सम्बन्ध करके चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली राज्य प्राप्त ककया। मलच्छववयों के दूसरे राज्य नेपाल के राज्य को उसके पुर समुद्रगुप्त ने ममलाया। हेमचन्द्र राय चौधरी के अनुसार अपने महान पूवववती शासक बबजम्बसार की भााँनत चन्द्रगुप्त प्रथम ने मलच्छवव राजकु मारी कु मार देवी के साथ वववाह कर द्ववतीय मगध साम्राज्य की थथापना की। उसने वववाह की थमृनत में राजा-रानी प्रकार के मसक्कों का चलन करवाया। इस प्रकार थपठट है कक मलच्छववयों के साथ सम्बन्ध थथावपत कर चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्य को राजनैनतक दृजठट से सुदृढ तथा आगथवक दृजठट से समृद्ध बना ददया। राय चौधरी के अनुसार चन्द्रगुप्त प्रथम ने कौशाम्बी तथा कौशल के महाराजाओंको जीतकर अपने राज्य में ममलाया तथा साम्राज्य की राजधानी पाटमलपुर में थथावपत की। समुद्रगुप्त- चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद ३५० ई. में उसका पुर समुद्रगुप्त राजमसंहासन पर बैिा। समुद्रगुप्त का जन्म मलच्छवव राजकु मारी कु मार देवी के गभव से हुआ था। सम्पूिव प्राचीन भारतीय इनतहास में महानतम शासकों के रूप में वह नाममत ककया जाता है। इन्हें परक्रमांक कहा गया है। समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनैनतक एवं सांथकृ नतक दृजठट से गुप्त साम्राज्य के उत्कर्व का काल माना जाता है। इस साम्राज्य की राजधानी पाटमलपुर थी। हररर्ेि समुद्रगुप्त का मन्री एवं दरबारी कवव था। हररर्ेि द्वारा रगचत प्रयाग प्रशजथत से समुद्रगुप्त के राज्यारोहि, ववजय, साम्राज्य ववथतार के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त होती है।  समुद्रगुप्त ने महाराजागधराज की उपागध धारि की।  ववन्सेट जथमथ ने इन्हें नेपोमलयन की उपगध दी। समुद्रगुप्त एक असाधारि सैननक योग्यता वाला महान ववजजत सम्राट था। यह उच्चकोदट का ववद्वान तथा ववद्या का उदार संरिक था। उसे कववराज भी कहा गया है। वह महान संगीतज्ञ था जजसे वीिा वादन का शौक था। इसने प्रमसद्ध बौद्ध ववद्वान वसुबन्धु को अपना मन्री ननयुक्त ककया था। काव्यालंकार सूर में समुद्रगुप्त का नाम चन्द्रप्रकाश ममलता है। उसने उदार, दानशील, असहायी तथा अनाथों को अपना आश्रय ददया। समुद्रगुप्त एक धमवननठि भी था लेककन वह दहन्दू धमव मत का पालन करता था। वैददक धमव के अनुसार इन्हें धमव व प्राचीर बन्ध यानी धमव की प्राचीर कहा गया है। समुद्रगुप्त का साम्राज्य- समुद्रगुप्त ने एक ववशाल साम्राज्य का ननमावि ककया जो उत्तर में दहमालय से लेकर दक्षिि में ववन््य पववत तक तथा पूवव में बंगाल की खा़िी से पश्गचम में पूवी मालवा तक ववथतृत था। कश्मीर, पश्गचमी पंजाब, पश्गचमी राजपूताना, मसन्ध तथा गुजरात को छो़िकर समथत उत्तर भारत इसमें सजम्ममलत थे। दक्षििापथ के शासक तथा पश्गचमोत्तर भारत की ववदेशी शक्नतयााँ उसकी अधीनता थवीकार करती थीं। समुद्रगुप्त के काल में सददयों के राजनीनतक ववके न्द्रीकरि तथा ववदेशी शक्नतयों के आगधपत्य के बाद आयाववतव पुनिः नैनतक, बौद्गधक तथा भौनतक उन्ननत की चोटी पर जा पहुाँचा था। रामगुप्त- समुद्रगुप्त के बाद रामगुप्त सम्राट बना, लेककन इसके राजा बनने में ववमभन्न ववद्वानों में मतभेद है|

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